शुक्रवार, 29 मार्च 2019

पुखराज का राज आज | नीलम और माणिक का कल था

#नीली_सलवार!
जनाब #सआदत_हसन_मंटो ने एक कहानी लिखी थी काली सलवार लेकिन इस पोस्ट का उससे कोई लेना देना नहीं जे अपुन की एकदम 100% सात्विक पोस्ट है...... दरअसल जे एक हिब्रू कहानी है किसने लिखी, नाम क्या था याद नहीं ......
भोत पहले जब रेलगाड़ी, बस, कार, फटफटिया वगैरह नहीं थे लोग घोड़ों, गधों, बैल गाड़ी से सफर करते थे गोरों के यूरोप में रोमन राज था तो बिधर के ईसाई धर्म कूँ मनाने वाले जेरुसलम की #तीर्थ_यात्रा की खातिर कई दिन या महीनों लंबा सफर तय करके आते थे.....
रोम से कारवां चलता और जेरुसलम पहुंचता रास्ते की हर मुसीबत को उठा भोत सारा पैसा खर्चा कर....... अब चूंकि यात्रा लंबी थी खर्चा खूब होता था तो ज्यादातर अमीर ईसाई ही इसकूँ करते..... गरीब गुरबा दूर से ही ओह्ह कमऑन जीसस...उँह ...जप लेते थे।
तो भिया उसी रोम में रैया करे थी एक लौंडिया और उसकी अम्मा... नाम था लौंडिया का नोरा.....वैसे भी नाम में के रख्या है...
...तो नोरा गरीब थी तो इधर उधर छोटे मोटे काम करके गुजर चाल री थी पर एक मुसीबत थी उसकी अम्मा उसकूँ रोज़ बोले थी नोरा मन्ने एक बेरी जेरुसलम घुमा दे.... एक बेरी तीरथ करा दे..... कदी मर गी तो म्हारी ख्वाहिस अधूरी रह जावेगी.... पर नोरा के करती उसके धोरै जहर खाण खातिर भी रुपिया कोणी था .... फिर नोरा ने एक दिन अपने मालिक जिसके यहां काम करे थी उसते कही... बाबू जी तुमाय पास भोत पैसा है मन्ने एक दो हज़ार का नोट दे देते तो मैं अपनी अम्मा को तीरथ घुमा देती...... मालिक भी असल काइयाँ टाइप था मौका ताड गया..... उसने देखा कुवारी लौंडिया जिसकूँ जे भी नहीं मालूम के दो हज़ार में तीरथ जाने का घंटा खर्च न निकलना ..... #उठा_लो_मौके_का_फायदा.... कल्लो बुढापा हरा
तो उसने नोरा से कही भाई में तन्ने दो के ढाई दे दूंगा पर तू बदले में के देगी.... नोरा बोली मेरे पास तो कुछ है नहीं..... बुढऊ बोला है काहे नहीं तू मन्ने अपना कौमार्य दे दे में पैसा दे दूंगा..... नोरा सोच में पड़ गई.... पर अम्मा को जेरुसलम ले जाना था कोई और रास्ता भी न दीखता था सो नोरा ने...... अपनी नीली सलवार खोल दी!!!
पैसे लेकर नोरा अपनी अम्मा के साथ चल दी तीरथ को...... पर जे का ससुर पैसा तो आठ दिन के सफर में ही घोड़ा गाड़ी का भाड़ा, टेंट, लकड़ी, खाने पीने में खर्च हो लिया..... अब नोरा बेचारी का करती, नज़रिया ठरकियों पै गढ़ गई..... फिर क्या था दिन भर जेरुसलम की यात्रा चलती और रात को किसी ठरकी बूढ़े, रंडवे अधेड़, नए जवान हुए सांड से लौंडे के तंबू में नीली सलवार यात्रा का खर्च जुटाती..... ये सब चलते चलाते नोरा पहुँच गई जेरुसलम और वहां पवित्र जगह खड़े हो बेहद खुश महसूस करते उसने दुआ की..... हे परम पिता जिसने मेरा कौमार्य भंग किया, जिन्हों ने रास्ते भर मेरी नीली सलवार उतरवाई में उनकी सब करनी भुला उन्ह मांफ करती हूं तू भी कर देना...... सलवार फटी तो क्या हुआ मुझे जेरुसलम तो मिल गया!!!!
बस कहानी यहीं खत्म पर कुछ सवाल बाकी रह गए.......
1. क्या ईस्वर भी नोरा की तरह उन सब नीली सलवार के उतरवाने वालों को माफ़ करेगा
2. क्या तीर्थयात्रा जैसे पवित्र उदेश्य के लिए नोरा का नीली सलवार उतारना पाप नहीं माना जायेगा
3. क्या नोरा की माँ अगर नोरा की सच्चाई जान जाती तो उसके धन जुटाने के तऱीके से सहमत होती......
वैसे इस कहानी का लखनऊ के किसी गेस्टहाऊस से कोई जुड़ाव नहीं है......आप खामख्वाह जोड़ें भी नहीं... शुद्ध धार्मिक कथा है ...फिर भी चाहें तो सवाल कुछ यूं पूछ सकते हैं....
1. क्या उन नेता के सजातीय भाई 22 साल सहे नखलउ कांड के तानों को भूल जाएंगे सैफई को मांफ कर देंगे अपनी नेता की तरह!
2.एक राजनेता का उद्देश्य निसंदेह सत्ता प्राप्ति ही है पर उसके लिए स्वाभिमान, गैरत को गिरवी रखना क्या उचित है।
3.क्या उन राजनेता के सहयोगी और कार्यकर्ता भी उनके सत्ता प्राप्ति के तऱीके में सहमत और सहयोगी होंगे!
खैर ये अपुन के सवाल जरूर हैं पर कहानी एक हिब्रू लेखक की तो बेवजह का सरस सलिल न बनाएं!
लेखक: अजय सिंह