सोमवार, 25 मार्च 2019

चीन की चतुराई और हमारी भावनाएं

#EkBarFirModiSarkar #NamoAgain2019
भगवा धारण करने वाले नये आगंतुकों का स्वागत व चीन को लेकर भावनाओ पर नियंत्रण रखना, आवश्यक है
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जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी जी की सरकार 2014 में आयी है तब से मेरी सक्रियता राष्ट्रवादि राजनीति से ज्यादा उसकी विचारधारा व उसके समर्थको के बीच रही है। मुझे, मेरी इस सक्रियता के कारण, समर्थको के भवनात्मक पक्ष व उनके ज्ञान की सीमाओं का काफी सार्थक अनुभव रहा है।
इसी अनुभव के आधार पर अपने राष्ट्रवादिता व हिंदुत्व के बंधुओ से आग्रह है कि अपने सार्वजनिक अचार व अभिव्यक्ति में दो महत्वपूर्ण बातों का अवश्य ध्यान रक्खें।
यह एक कटु सत्य है कि जब भी चुनावो की तिथि घोषित हों जाती है और चुनावी मौसम में बड़े बदलाव बदलते दिखते है तो राजनैतिक व्यक्तित्व भी पाले बदलते है। जो व्यक्ति 24 घण्टे पहले आपका धुर विरोध कर रहा होता है वही आपका भगवा पहन आपके बीच हाथ जोड़े खड़ा हो जाता है। मैं जानता हूँ यह सब बड़ा कष्ट दे जाता है लेकिन इस सबको राजनीति की शतरंज में मोहरे से ज्यादा कुछ नही देखना चाहिए।
यहां आपको यह स्वीकारना होगा कि आया हुआ व्यक्ति जितना भी कलुषित है, वो सिर्फ चुनावी बिसात में चलाया गया मोहरा है। जिसे आपके नेतृत्व ने, विपक्षी खेमे को मनोवैज्ञानिक रूप से परास्त करने के लिए चलाया है। यह चलाया गया मोहरा कितना सफल हुआ, हम लोगो को तो खेल के समाप्त होने पर ही कुछ कुछ पता चलता है लेकिन नेतृत्व हमेशा इस मोहरे की चाल को, चुनाव के परिणामो से, अपनी विचारधारा को दृढ़ता स्थायित्व प्रदान करने की दृष्टि से चलाती है।
अतः हम लोगो के लिए प्रथम महत्वपूर्ण शिक्षा यह है कि चुनावी बहार में जो भी भगवा ओढ़ ले, उसको लेकर कोई कटाक्ष या उसके विरोध में कुछ नहीं कहना है। इसको लेकर हम लोगो को कोई भी बौद्धिकता या नैतिकता नही झाड़नी है, यह सब 23 मई 2019 के बाद कर लीजिएगा। यदि किसी के आने से आपको बहुत कष्ट है तो मेरी सलाह है कि बड़े उद्देश्य के लिए, इस मुद्दे पर मौन धारण कर लीजिये।
अब दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि मेरा अनुभव रहा है कि राष्ट्रवाद व हिंदुत्व के समर्थको में कूटनीति व विदेशनीति को लेकर गम्भीर ज्ञान नही होता है और ज्यादातर वे अपनी प्रतिक्रियाएं, विशेष रूप से चीन को लेकर, मूल तथ्यों के आधार पर न देकर, भावना के आधार पर देते है। मेरा यहां पर अपने बंधुओ से आग्रह है कि कूटनीति व विदेशनीति बहुत दुरूह विषय होता है, अतः इसके विषयों पर अपनी प्रतिक्रिया भावना के आधार पर न दे बल्कि नेतृत्व की स्टोरी लाइन व उसकी आधिकारिक प्रतिक्रिया को समझने का प्रयास करे व उसी के पीछे खड़े रहें।
इसको विशेषकर चीन के संदर्भ में समझना जरूरी है। पूर्व में हम लोगो ने देखा है कि भारत की पूर्वोत्तर सीमाओं पर चीन की आक्रमकता व जैश ए मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को सुरक्षा परिषद में बचाने को लेकर भारत मे बड़ा हो हल्ला होता है। हम लोगो का एक नारा होता है भारत को चीन से व्यपारिक सम्बंध समाप्त कर देने चाहिए या फिर चीन के बने सामानों पर टैरिफ बढ़ा देना चाहिए ताकि भारतीय बाजार में उनकी कीमत महेंगी हो जाये।
मैं समझता हूँ कि चीन के विरोध में इस तरह की मांग करना बेवकूफी है क्योंकि आज के वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन के ज़माने में यह संभव ही नही है और दूसरा बिना भारत को आर्थिक रूप से गम्भीर चोट पहुंचाये यह करना असंभव है। भारत चीन में ट्रेड बैलेंस इतना ज्यादा है कि इससे चीन से ज्यादा भारत को तत्कालीन नुकसान होगा। यदि चीन से वाणिज्य में निपटना है तो भारतीय उपभोक्ता को अपनी स्वेच्छा से चीन के बने सामानों का बहिष्कार करना होगा ताकि भारतीय व्यपारी चीन से सामान लाना बन्द करे और भारतीय व्यपारी, उपभोक्ता को उद्यमी बनकर, सार्थक विकल्प दे।
यह तो हो गयी हमारे पक्ष की बात, लेकिन इसको चीन के परिपेक्ष में भी समझना होगा। चीन अपने पड़ोसी भारत को उसका बाजार से आगे जाकर, विश्व के बाजार के लिए उसका प्रतिद्वंदी बनते देख रहा है। यह उसके हितों के विरुद्ध है। चीन यह देख रहा है भारत का आज का नेतृत्व यानी मोदी सरकार वह सब तेजी से कर रही है जिससे भारत की कमजोर सीमा क्षेत्र मजबूत हो और उसमे आर्थिक सुदृढता आये। चीन अच्छी तरह जानता है कि जैसे जैसे भारत अपनी सीमाओं को मजबूत कर लेगा व आर्थिक रूप से मजबूत होगा, वैसे वैसे उसके विश्व नायकत्व के सपने धूमिल होते जाएंगे।
अब यह सोचिए कि यदि आप चीन से है तो फिर चीन को अपने स्वार्थ में क्या करना चाहिए?
अब तक चीन ने भारत को अपनी शानदार कूटनीति व भारतीय वामपंथी सहयोगियों की सहायता से भारत के अदूरदर्शी राजनैतिक नेतृत्व को दबा कर रखने में सफल रहा है। चीन 50 के दशक से ही अरुणाचल प्रदेश समेत पूर्वोत्तर प्रदेशो की चीन से लगी सीमाओं पर अपना अधिकार दिखाता रहा है और उसके लिए, वह वहां की तमाम आतंकवादी व अलगाववादी संघठनो को प्रश्रय देता रहा है। स्वयं भारत का राजनैतिक नेतृत्व इतना नपुंसक व कंप्रोमाइसड रहा है कि वह चीन की हर घुड़की के आगे दबता रहा है और उसके परिणामस्वरूप, पूर्वोत्तर प्रदेश, शेष भारत से कटे व अविकसित रहे है।
यही सब 2014 के बाद बदल गया है और चीन की दूरगामी वैश्विक नीति में दरार पड़ गयी है। भारत, एक तरफ चीन द्वारा खड़ी गयी 3000 आतंकवादियों की अराकान आर्मी, जो मिजोरम को जल मार्ग से शेष भारत से जोड़ने वाली कलादान ट्रांजिट प्रॉजेक्ट को नष्ट करने के लिए, 1000 किमी दूर विस्थापित की गई थी उसको बिना किसी हो हल्ले के 15 दिनों में पूरी तरह समाप्त कर देती है और दूसरी तरफ आप यह भी उम्मीद करते है कि चीन, मसूद अजहर को लेकर, भारत के पक्ष में वोट देगा? यह सोचना ही बेवकूफी है।
चीन ने कई दशक व करोड़ो डॉलर अराकान आर्मी को खड़ा करने में लगाये थे जिसको भारत ने अपनी सुरक्षा के लिए म्यांमार की सेना के सहयोग से पूरी तरह खत्म कर दिया है। यह सीधी सी बात है कि यदि हम चीन के सपनो को तोड़ेंगे तो हमे भी अपने सपनो के टूटने को समझना होगा।
बात सिर्फ पूर्वोत्तर प्रदेशो की नही है, बात गिलगित बाल्टिस्तान और बलोचिस्तान की भी है जहां 62 बिलियन डॉलर के निवेश पर सिपेक बन रहा है। आज चीन का यह निवेश, चीन के राजनैतिक वर्ग की विश्वप्रभुत्व के सपने की प्राथमिकता है। यदि गौर से अंतराष्ट्रीय समाचारों को पढ़े, तो आप को पता चलेगा कि पिछले कुछ महीनों से बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना की पोस्टों व सिपेक के तहत चल रही परियोजनाओं में धमाके हो रहे है। पाकिस्तानी सेना व चीनी परियोजना में काम कर रहे लोग मारे जारहे है।
हम भारतीय लोगो के लिए यह बलूचियों का आज़ादी के लिए विद्रोह है लेकिन चीन समेत अन्य विश्व की शक्तियों के लिए यह भारत की तरफ से चीन की सिपेक परियोजना की कीमत बढाना है। बलूचिस्तान में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी के द्वारा मारा गया हर चीनी या पाकिस्तानी, भारत के खाते में जाता है। हम भारतीय व भारत की सरकार इस सबसे आधिकारिक रूप से भले इनकार करे लेकिन चीन जानता है कि उसके सपनो की कीमत भारत बढ़ाता जारहा है। उसको इस बात का डर है कि कहीं चीन की महत्वकांशी सिपेक परियोजना, वित्तीय रूप से अव्यवहारिक न हो जाये।
चीन की यही परेशानी, उसको सर्वजिनिक रूप से कांग्रेस के करीब ले आयी है और 2019 में मोदी सरकार की वापसी को रोकने के लिए पाकिस्तान के साथ कांग्रेस का सभी स्तर पर सहयोग कर रही है।
हमको इसी कांग्रेस, चीन और पाकिस्तान के गठजोड़ के सपनो को तोड़ना है और नरेंद्र मोदी जी को भारत व अपनी पीढ़ी के स्वर्णिम भविष्य के लिए, फिर से भारत का प्रधानमंत्री बनवाना है।
#pushkerawasthi