रविवार, 24 मार्च 2019

दो विचार धाराओं के बीच का अंतर

दो घटनाएं देखिए और दुनिया में फैली दो विचारधाराओं का व्यवहार देखिए।
पहली घटना सूदूर न्यूजीलैण्ड की है। वहां एक इस्लाम पीड़ित व्यक्ति हाथों में बंदूक लेकर नमाज पढ़ते हुए पचास लोगों को मौत के घाट उतार देता है। उसे तत्काल गिरफ्तार किया जाता है और उस पर पचास लोगों की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया जाता है।
लेकिन उस अपराधी के अपराध से पूरा न्यूजीलैण्ड इस प्रकार आहत हो जाता है कि वहां ईसाई महिलाएं हिजाब पहनकर अपनी हमदर्दी दिखा रही हैं। संसद कुरान की आयत से शुरु होती है और मौलवी को बुलाकर शांतिपाठ करवाया जाता है। इतने से भी उनका प्रायश्चित पूरा नहीं होता तो घोषणा करते हैं कि शुक्रवार को राष्ट्रीय टेलीवीजन और रेडियो से अजान का प्रसारण होगा।
यह सब इसलिए क्योंकि उनकी किसी किताब में नहीं लिखा कि तुम्हारा धर्म न माननेवालों को तुम्हें कैसे खत्म करना है। इसलिए उन्हें प्रायश्चित हो रहा है कि हमारे बीच से कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के साथ ऐसा कैसे कर सकता है। लेकिन जिनकी किताब में लिखा है कि धरती से गैर मुस्लिमों को कैसे खत्म करना है, अब जरा उनका व्यवहार देखिए।
दो दिन पहले पाकिस्तान के घोटकी में दो दलित हिन्दू लड़कियों रीना और रवीना मेघवार का अपहरण करके उन्हें इस्लाम कबूल करवा दिया जाता है। दोनों नाबालिग लड़कियों की जिनकी उम्र क्रमश: १२ और १४ साल है उनकी उम्र से बड़े आदमियों से निकाह कर दिया जाता है। सोशल मीडिया पर चर्चा होती है। जमीन पर धरने प्रदर्शन होते हैं। एफआईआर दर्ज करवायी जाती है लेकिन न तो पाकिस्तानी प्रशासन कोई कार्रवाई करता है और न वहां का मीडिया इस मुद्दे को उठाता है। ऊपर से दो दिन बाद एक मौलवी उन दोनों नाबालिग लड़कियों को लेकर मीडिया के सामने आता है और बताता है बहुत समय से (शायद गर्भ में थीं तभी से) दोनों लड़कियां इस्लाम कबूल करना चाहती हैं, हमने उन्हें अब मौका फरहाम कर दिया है।
पाकिस्तान में हर साल हिन्दू लड़कियों के जबरन अपहरण की ऐसी दर्जनों घटनाएं होती हैं लेकिन वहां कोई मुसलमान इसके खिलाफ नहीं बोलता। बोलेगा कैसे? आखिर उसकी किताब उसे बोलने की इजाजत कहां देती है? वह जानता है कि इस्लाम तो यही है जैसे हो सके सबको मुसलमान बना देना है। अगर कोई अपहरण करके बना रहा है तो गलत क्या कर रहा? गैर मुस्लिम लड़कियों को अगवा करना इस्लाम की ऐसी खिदमत है जिससे धीरे धीरे हर गर्भ से सिर्फ मुसलमान पैदा होगा। इसलिए अगर कोई गैर मजहबी लडयकियों का अपहरण कर रहा है, उनके साथ लव जिहाद कर रहा है तो वह तो इस्लाम की सच्ची खिदमत ही कर रहा है। इसलिए मुसलमान चुप रहता है। उसे कोई दुख नहीं होता। उसके मन में प्रायश्चित के कोई भाव नहीं आते। ऐसी घटनाओं का मुखर होकर विरोध तो छोड़िए, एक शब्द लिखता बोलता तक नहीं।
दुनिया के यही दो विरोधाभाष हैं जिनमें मानवता तिल तिल कर पिस रही हैं।

संजय तिवारी की फेसबुक वॉल सर साभार