रविवार, 24 मार्च 2019

केसरी फ़िल्म रिव्यू

1897 में हुए सारागढ़ी युद्ध पर आधारित ये फ़िल्म जिसतरह सिक्खों के बहादुरी को दिखाती है...,जिसमें दस हज़ार अफगानी जिहादियों पर मात्र 21 सिक्ख सैनिक भारी पड़े थे...,
आजतक किसी भी फ़िल्म ने सिक्खों के लिए इतना सम्मान नहीं बढ़ाया होगा...,
कहानी-
ब्रिटिश हुकूमत में भारतीय सीमा पर तैनात तीन किलों...,जिनमें सारागढ़ी बीच का एक छोटा सा किला है...,
जो सिर्फ बाकी के दोनों किलों को आपस में संदेश पहुँचाने के काम आता है...,
यहाँ पर किले की हिफाज़त के लिए 21 सिक्खों की टुकड़ी तैनात है...,इस टुकड़ी को “36 सिक्ख रेजिमेंट" का नाम दिया गया है...,
हवलदार ईशर सिंह(अक्षय कुमार) को यहाँ का चार्ज लेने के भेजा गया है...,
दूसरी तरफ एक अफगानी मुल्ला मौलवी अफगान कई लश्करों को जिहाद के नामपर एक करके उन्हें भारत पर हमला करने की योजना बनाता है...,
तीनों किलों में सबसे कमजोर सारागढ़ी का किला है...,और अगर इसपर सुबह ही हमला कर दिया जाय तो बाकी दोनों बड़े किलों तक कोई संदेशा नहीं पहुँच सकता...,
और फिर शाम तक बाकी दोनों किलों पर भी आसानी से फतह की जा सकती है...,
ये सोचकर दस हज़ार अफगानी जिहादी सारागढ़ी किले पर हमला कर देते हैं...,जहाँ सिर्फ 21 सिक्ख तैनात हैं...,
डायरेक्शन-
शायद डायरेक्टर अनुराग सिंह की ये पहली हिंदी फ़िल्म है...,फ़िल्म की कहानी जब इतनी दमदार और रियल हो तो डायरेक्शन में कुछ खास करने के लिए बचता ही नहीं...,
फिर भी यहाँ पर डायरेक्टर अनुराग सिंह ने कुछ ऐसे सीन्स दिए हैं जो अलग हैं...,
फ़िल्म के अंत में वाला सीन मेरे लिए अलग ही अनुभव था...,
सबसे ज्यादा तारीफ़ इसबात के लिए होनी चाहिए कि...,
सिर्फ अक्षय कुमार को ज्यादा सेन्टर में न रखते हुए बाकी के 20 सिक्ख सैनिकों का रोल भी फ़िल्म में भरपूर दिखाया गया है...,
खासकर सबसे छोटेवाले सिक्ख सैनिक के रोल को तो अक्षय से भी बेहतर दिखाया गया है...,
एक्टिंग-
इस में अक्षय की अबतक की सबसे बेस्ट एक्टिंग कही जा सकती है...,
कभी एक्टिंग कॉलिमेंट के नामपर फर्नीचर से तुलना किया जानेवाला बन्दा दिन ब दिन निखरता जा रहा है...,
जब पचास जिहादियों के बीच अकेला तलवार लेकर गरजता है तो सचमुच किसी सिंह(शेर) से कम नहीं लगता...,
उसवक्त अक्षय की आँखे ऐसे चमकती हैं जैसे मानों महादेव स्वयं तांडव कर रहे हैं...,
बाकी के कलाकारों ने अपना बेस्ट दिया है...,कोई भी कहीं से भी कम नहीं लगता...,
वॉर सीक्वेंस-
इस फ़िल्म में वार सीन्स भर भर के हैं...,और कई सीन्स पहली बार देखने को भी मिलेंगे...,फ़िल्म का सेकंड हाफ पूरा वॉर से ही भरा है...,
क्लाइमेक्स के 30 मिनट के वॉर सीन्स आपको अपने जगह से हिलने नहीं देंगे...,
बस एकाध कमी ये खली कि कुछ वार टेक्निक्स भी दिखाए जा सकते हैं...,21 सैनिकों का दस हज़ार जिहादियों को धूल चटाना इतना आसान नहीं है...,
ज़रूर ही उस समय शौर्य के साथ साथ कुछ अलग युद्ध तकनीकों का इस्तेमाल किया गया होगा...,
फिल्म के बैकग्राउंड म्यूजिक और गाने भी फ़िल्म को सपोर्ट करते हैं...,फ़िल्म कहीं से भी निराश नहीं करती...,
क्लाइमेक्स में आपको हमारे सिक्ख पर गर्व और सम्मान इतना बढ़ जायेगा कि...,आपकी आँखों में आँसू भी आ सकते हैं और आप निःशब्द होकर हॉल से बाहर निकलेंगे...,
हमारे सिक्ख भाइयों के शौर्यगाथा बतलाती इस फ़िल्म को एकबार एकबार देखना ही चाहिए...,
आर्या तिवारी की फेसबुक वॉल से साभार