रविवार, 31 मार्च 2019

बिहार की बर्बादी और लालू की आबादी

10 मार्च 1990 को बिहार की गद्दी पर लालू प्रसादजी यादव का शपथ ग्रहण हुआ। वे बिहार के मुख्यमंत्री नियुक्त हुए। उनका यह टर्म 28 मार्च 1995 तक चला। आज देश में विकास की बहुत बात हो रही है, लालूजी के काल मेें सिर्फ माई समीकरण की बात होती थी। माई का मतलब था, मुसलमान और यादव। इस जोड़ी के दम पर कथित तौर पर बिहार में लालूजी और राबड़ीजी की जोड़ी ने पन्द्रह साल राज किया।
आज लालूजी और राबड़ीजी की पार्टी लोक सभा चुनाव 2019 में फिर एक बार सक्रिय नजर आ रही है तो लगा कि ऐसे समय में लगे हाथों लालूजी ने बिहार को अपने शासन काल में जो दिया उसकी थोड़ी चर्चा कर ली जाए। उससे पहली बार मतदान करने वाले युवाओं को परिचित कराया जाए।
लालूजी के 1990—95 वाले शासन काल में बिहार का विकास दर शून्य था। बिहार में 80 फीसदी लोग उस दौरान खेती पर निर्भर थे। खेती का बिहार की जीडीपी में 40 फीसदी का योगदान था। खेती में विकास उस दौरान एक फीसदी से भी कम रहा।
वर्ष 2000—2005 के बीच बिहार की मुख्यमंत्री राबड़ी देवी थीं। इस दौर में बिहार ने अपना सबसे खराब समय देखा। उस समय सबसे अधिक कर्ज बिहार के ऊपर था। राजकोषिय घाटा और व्यय के असंतुलन ने बिहार को कहीं का नहीं छोड़ा था। लालूजी और राबड़ीजी के शासन में गुंडागर्दी चरम थी और कारोबार चौपट होता गया। बिहार में चल रहे राष्ट्रीय जनता दल के राज को 'जंगलराज' की संज्ञा मिली। आज ईवीएम पर सवाल उठाए जा रहे हैं लेकिन लालूजी के राज में जब सारे सर्वेक्षण उनकी हार की घोषणा कर रहे होते और वे पूरे दावे से मीडिया में बताते थे कि बैलेट बॉक्स से जिन्न निकलेगा और राजद के लूटेरे बूथ लूटकर लालूजी की जुबान रख लेते थे। इसीलिए आज फिर लालूजी के गुट में शामिल नेता बैलेट वापसी की मांग करते नहीं थकते।
मतलब देश में एक तरफ विकास के लिए गुजरात मॉडल प्रसिद्ध था और दूसरी तरफ बर्बादी का लालू मॉडल था। बिहार की तरक्की ना हो फिर यह कैसे संभव था कि ​राज्य में यादव, कुर्मी, पासी, माझी या अन्य पिछड़ी जाति का समाज तरक्की कर जाता? सभी जाति और वर्ग के लोगों ने जमकर बिहार से पलायन किया। यह 1990 से 2005 का कालखंड का था, जिसमें बिहारी होना पूरे देश में गाली बन गया। बिहारी होने को गाली बनाने में राबड़ीजी और लालूजी का अमूल्य योगदान है। जिसे बिहारीजन नहीं भूला सकते।
साभार
आशीष कुमार अंशु