मंगलवार, 26 मार्च 2019

न्यूजीलैंड का डेमोग्राफिक विचलन

डेमोग्राफिक विचलन
सन १६४२ में पहली बार ब्रिटिश कैप्टन जेम्स कुक न्यूज़ीलैंड पहुंचा तो उसका घोर विरोध किया गया। कैप्टन के पहुंचने से पहले ये छोटा देश 'माओरी आदिवासियों' का हुआ करता था। ब्रिटिशों और माओरी में कई हिंसक संघर्ष हुए, तब जाकर योरप के लोग यहां प्रवेश कर सके थे।
क्राइस्टचर्च की मस्जिद में हमला करने वाला शख्स देश की बदल रही डेमोग्राफी से चिंतित था। उसे आतंकी हमलों के बढ़ने का डर सता रहा था इसलिए उसने पचास लोगों की हत्या कर डाली। मज़े की बात इसी व्यक्ति के पूर्वजों ने माओरियों की हत्याएं करके न्यूज़ीलैंड की नई डेमोग्राफी गढ़ दी थी। आज ऐसा ही उनके साथ हो रहा है। इतिहास खुद को दोहराकर सबक देता है।
हमले के बाद न्यूज़ीलैंड का माओरी समुदाय मुखर रूप से इस हमले के खिलाफ हो गया है। उनके नेता ने सार्वजनिक रूप से मुस्लिमों को कड़ा समर्थन दिया है। मुस्लिम+माओरी गठबंधन भविष्य में न्यूजीलैंड की सत्ता पर काबिज़ होंगे। इस देश मे एशियाई मूल के लोगों की तादाद तेज़ी से बढ़ रही है। हज़ारों माओरियों ने मुस्लिम धर्म अपना लिया है। इस समुदाय को 'माओरी मुस्लिम' के नाम से जाना जाता है।
'गोरा समुदाय' डेमोग्राफिक विचलन से यूँ ही नहीं भयभीत है। बेल्जियम का उदाहरण सामने है। पिछले वर्ष यहां के मुस्लिम उम्मीदवारों ने शरिया लागू करने को चुनावी मुद्दा बना लिया। जबकि इस समुदाय ने बेल्जियम में अठारहवीं सदी में प्रवेश किया। वे १९६० तक यहां जनसंख्या बढ़ाने में सफल हो गए। और आज वे बेल्जियम का संविधान बदलने की स्थिति में पहुंच चुके हैं।
विश्व में इस्लाम की रैपिड ग्रोथ का कारण बड़ा स्पष्ट है। एशिया को छोड़ बाकी संसार मे ईसाइयत के प्रति विश्वास तेज़ी से घट रहा है। चर्च तेज़ी से बंद हो रहे हैं। उनमें होटल, क्लब और बियर बार खुल रहे हैं। फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड और इटली तक मे ईसाइयत संकट में आ चुकी है। लोग इस्लाम की ओर बड़ी संख्या में आकर्षित हो रहे हैं।
इसी साल 'इंग्लैंड चर्च' ने अपने यहां के चर्चों में रविवारीय नियमित प्रार्थना की बाध्यता खत्म कर दी। चर्च श्रद्धालुओं की घटती संख्या से परेशान है। 'गोरा समुदाय' दोनों ओर से घिर चुका है। एक ओर घुसपैठ और दूसरी तरफ इस्लाम का बढ़ता प्रसार उसे संकट में डाले हुए हैं।
डेमोग्राफिक विचलन विश्व के सामने एक बड़ी समस्या है। हम न्यूज़ीलैंड को 'बेल्जियम' और बेल्जियम को १९४७ वाला भारत बनते देख रहे हैं। भारतवर्ष ने ये गलती सबसे पहले की थी। क्या विश्व उसे दोहराने जा रहा है। एक समुदाय की सब कुछ लील जाने की मानसिकता के सामने राजनीतिक रूप से शरणागत हो जाने के लिए तैयार हो चुका है।
तरीका बदल गया है लेकिन साम्राज्य बढ़ाने की मानसिकता वैसी की वैसी
- पहले शरण मांगो
- शरण मिल जाए तो नागरिकता मांगो
-नागरिकता मिल जाए तो स्कूलों में इस्लामिक शिक्षा और हलाल का मटन मांगो
- तादाद बढ़ जाए तो छाती पर चढ़कर शरिया मांगो।
- फिर देश राजनीतिक और धार्मिक रूप से आपके कब्जे में आ जाता है।
बेल्जियम और न्यूजीलैंड इसके जलते हुए उदाहरण बन गए हैं।

साभार  
विपुल विजय रेगे