गुरुवार, 21 मार्च 2019

बीएसएनएल के साथ समस्या

BSNL ....बात निकली तो बहुत दूर तलक जायेगी
अगर आप उद्यमी हैं, मैन्युफैक्चरर हैं तो जैसे ही आप कुछ मुनाफा करने लगेंगे, उसका बड़ा हिस्सा विस्तार के लिए निवेश भी करेंगे . हो सकता है कि बैंक लोन भी ले सकते हैं विस्तार के प्लान दिखाकर. फिर मुनाफे का काफी हिस्सा लों चुकाने में भी जाता रहेगा.
लेकिन विस्तार तथा अपग्रेड से मुनाफा भी होता रहेगा. ऐसा नहीं की नून रोटी की नौबत आयेगी. व्यवसाय में यह सब आवश्यक होता है. वैसे यह बहुत संक्षेप में समझाने की कोशिश है, व्यवसायी ये जानते ही हैं. प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारी भी इस बात को जानते हैं, उन्हें भी यह पता होता है कि tomorrow is always a battle. हर रोज लड़ाई है, हर रोज जीतना है तभी जी सकते हैं. हमेशा यही रहा है. ऐसे निर्मम परिस्थिति में भी औद्योगिक साम्राज्य खड़े रहते हैं, फलते फूलते हैं. क्योंकि लड़ते हैं. नयी नयी बदलती परिस्थिति, नए निर्माण होते मार्केट्स के साथ विलुप्त होते मार्केट्स को भी पहचानना, टिके रहने के लिए योग्य उपाय योग्य समयपर करना यह सब वे ऑफ लाइफ है, उसमें कोई शक नहीं.
सरकारी उपक्रमों के साथ मानसिकता क्यों बदलती है ? क्योंकि हर कोई कर्मचारी है, कंपनी किसी की नहीं. प्राइवेट में जब मुनाफा होता है तो अक्सर आगे के लिए इन्वेस्टमेंट भी होती है, यूनियनवाले कुछ भी कहें. गरीबी के कारण किसी का बच्चा मर जाता है उस समय कामरेड मालिक की विदेश में मनाई छुट्टी की बात उठाकर भड़काने की कोशिश करता है लेकिन अगर तनख्वाह समय पर मिलती हो और साल दर साल इन्क्रीमेंट भी होता हो, मजदूर और अन्य कर्मचारी उसका साथ नहीं देते. यही हाल कामचोर या ढीठ को निकल देनेपर होता है, कोई सहानुभूति नहीं मिलती.
पब्लिक सेक्टर में मानसिकता इसके विपरीत होती है. तनख्वाह हक माना जाता है और काम करना अपने बॉस पर एहसान. और ऊपर के परिच्छेद में लिखी जो बात है, कंपनी किसी की नहीं. अतएव जब मुनाफा होता है तब अगर यूनियनवाले कहते हैं कि इसे बांटा जाए, सैलरियाँ बढाई जाए तो कोई यह नहीं कहता कि यह पैसे फ्यूचर एक्स्पान्शन के लिए चाहिए, उसके लिए तो सरकार से सहायता मांगना हक हो जाता है. पैसे जब तक आते रहते हैं, यूनियन से कोई लड़ता नहीं.
यूनियन लीडर कोई कर्मचारी ही होता है और अफसरों पर अपनी धाक बनाए रखने की ही मानों सैलरी लेता है. कामचोरों की और वाकई चोरों की भी ढाल बनता है, शायद ही किसी को नौकरी से निकालने देता है. कंपनी की परफॉरमेंस की उसे कोई पड़ी नहीं रहती, और प्रॉफिट हो तो केवल बंदरबांट के लिए होता है. बाकी उसके और बड़े राजनीतिक सपने होते हैं जिसके लिए कंपनी के मजदूर उसके लिए हक की भीड़ होती है.
ऐसे में जो कंपनी अगर प्राइवेट हाथों में होती तो अवश्य मुनाफा कमाती वो घाटे में आकर बीमार होती है और सरकार पर याने पर्याय से देश पर बोझ बन जाति है. लेकिन इतना साफ़ लिखने पर आप को न जाने क्या क्या कहा जाएगा. लेकिन कभी कोई यह नहीं सोचता कि प्रदेश के नौजवानों को रोजी रोटी के लिए पलायन क्यों करना पड़ रहा है, स्थानिक अवसर समाप्त क्यों हुए, इसमें किसका हाथ है? समस्या सुधारना मुश्किल है, गाली देना आसान है. मसि का दाग लग तो दो सेकण्ड में लगता है, धो डालने में कपड़ा भी फट सकता है.
ये मसि की बोतलें लेकर घूमनेवाले गिद्ध होते हैं, इनको दूर से ही देखते ही मार डालने चाहिए. क्योंकि इनके लगाए दागों को धोने में जो फट जाता है वह शर्ट आप का है. 
Anand Rajadhyaksha की फेसबुक वाल से साभार 

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