रविवार, 31 मार्च 2019

इस फोटो का मोदी जी से क्या संबंध है ?

इस फोटो  का मोदी जी से क्या संबंध है ?
यह फोटो आप सब ने बहुत बार देखा होगा ।  तो आप सोच रहे होंगे कि इस फोटो का मोदी जी से क्या संबंध हो सकता है ? यह तो सहारनपुर दंगों का फोटो है जहां एक अकेला सीख लड़का निर्भयता से एक  शांतिपूर्ण भीड़ के सामने खड़ा है और भीड़ के चेहरे पर उनकी फेवरिट आसमानी सीख वाली शांति फैली है ।
अब एक और बात बताता हूँ जो कहीं लिखी नहीं गयी है लेकिन दिख तो रही है । यह फोटो लड़के के सीधे पीछे से लिया गया है । बस यही अनकही बात है और इस फोटो का राज़ है । यह कहीं नहीं बताया गया कि लड़के के पीछे कितने लोग खड़े थे, वे कौन थे और कैसे थे ।
यह बात सभी जानते हैं कि सिक्खों में एकता अच्छी होती है और जुझारू भावना भी । सहारनपुर के सरदारों ने भी कड़ाई से काम लिया इसीलिए टीपू मियां की सरकार होकर भी मुसलमानों से हारे नहीं ।  लेकिन यह मूल विषय से थोड़ा भटकाव हो रहा है तो मूल विषय पर आते हैं ।
हमें यह नहीं बताया जा रहा है कि उस लड़के की पीछे कौन हैं, उनकी संख्या क्या है तथा उनकी अवस्था क्या है । क्या इतनी खूंखार झुंड वह भी मुसलमानों की - जिनको अपनी सामूहिक ताकद पर बेहद भरोसा है कि जो होगा संभाला जाएगा -  एक अकेले निहत्थे लड़के को बख्शेगी; अगर उसके पीछे कोई भी दिख न रहा हो ?  ज़रा लॉजिकली सोचिए ।
यही अपनों की एकजूट,  यही एहसास कि मैं अकेला नहीं हूँ,  मेरे सभी साथी मेरे साथ ही चल रहे हैं, मैं बस एक ही कदम आगे हूँ, मुझपर हाथ उठाया गया तो वे कहर बरपा देंगे -  यही एहसास अकेले आदमी को नि: शस्त्र आगे बढ़कर सामना करने की हिम्मत देता है। हाँ हाथ में शस्त्र हो और वह भी कोई AK श्रेणी की हो तो वह भी बहुत बड़ी हिम्मत देता है, लेकिन यहाँ बात हो रही है निहत्थे और अकेले खूंखार भीड़ के सामने खड़े होने की ।
जहां अपने साथियों की ऐसी गैरंटी न हो वहाँ कोई निहत्था आगे नहीं जाता । आगे चलते चलते अगर पीछे आते कदमों की आहट धीमी पड जाये और सुनाई देना बंद ही हो जाये तो पीछे मुड़कर देखना लाज़मी है और उसी हिसाब से क्या करना है यह सोचना भी । क्योंकि जान बचे तो ही फिर से लड़ा जा सकता है,  मृत्यु निरर्थक नहीं होनी चाहिए ।
अब बताइये, क्या आप यहाँ तक सहमत हैं ?
अब इस फोटो का मोदी जी से संबंध आप को समझ में आया होगा। गुजरात का मोदी,  केंद्र के मोदी से अलग क्यों है इसके सब से बेहतर कारण मोदी जी ही बता सकते हैं,  हम केवल अंदाज लगा सकते हैं । वैसे यह तो सर्वविदित है कि जनता में उनको ले कर जो आशाएँ थी उनके कारण भाजपा को मजबूरी में उनको चुनना पड़ा था, बाकी दावेदार काफी थे जो आज भी मौके की तलाश  में हैं ।
नेताओं के बारे में आरोप नहीं लगाना चाहता,  विवादों में ठोस सबूतों के अभाव में बात भटक जाएगी। जनता की ही बात करें तो क्या आप ने ऐसी पोस्टस कम देखी हैं जहां तथाकथित भाजपा समर्थकों ने नाराजगी की कीमत चुकानी पड़ेगी की गर्जनाएँ की हैं और जहां भाजपा हारी है वहाँ अपनी ताकद दिखा कर सबक देने की भी दर्पोक्ति की है ?
गुजरात में जो पकड़ थी उसे भी आने में समय लगा था । वैसे एक राज्य के मुख्यमंत्री बने रहते तो शायद इतना ध्यान नहीं दिया जाता लेकिन प्रधानमंत्री के चैलेंजेस अलग होते हैं । कठपुतलियों  को चलाने की आदि ताक़तें पूरा पूरा ज़ोर डालेंगी यह तो समझ में आता है । बाकी नियमों का भंडार ऐसा है कि सभी संहिताओं को ताक पर रखकर तानाशाही के सिवा सत्ताधारी अपनी मनमानी नहीं कर सकते । या फिर सिस्टम के साथ हिस्सेदारी कर के, जैसे कॉंग्रेस करती थी। तानाशाही भी ठीक नहीं होती क्योंकि क्रूरता तानाशाही में built in और जरूरी होती है,  और तानाशाह अपनी सत्ता सिस्टम के द्वारा ही चला सकता है । ऐसे में सिस्टम के लोगों के कृत्यों की ज़िम्मेदारी उसकी ज़िम्मेदारी हो जाती है । क्या एमर्जन्सि के दौरान सभी कुकृत्य करने इंदिराजी या संजय गांधी स्वयं हर जगह आए थे ? लेकिन सिला तो उन्हें ही देना पड़ा ना ?
बाकी रही बात जनता की, तो IC 810 के मामले में सरकार पर रोना धोना करके दबाव डालनेवाली जनता बदली नहीं है । बल्कि आज तो यहाँ तक मामला है कि रेल यात्राओं में असुविधा होने पर सीधा मोदी जी को बड़े अक्षरों में नीच लिखनेवाले भी हैं । टैक्स रिफॉर्म से धंधे का स्वरूप बदला तो मुनाफा कम हुआ कहकर मोदी जी के नाम से रोनेवालों की बड़ी संख्या मिलेगी, जहां पूछनेपर पता चलेगा कि मुनाफा कच्चे के काम से होता था। लेकिन यह पूछना आप की बदतमीजी या गुनाह भी माना जाएगा, आप को हिन्दू द्रोही, भगवा वामी आदि भी कहा जाएगा।
उस फोटोवाले सिक्ख लड़के का कॉन्फ़िडेंस गुजरात के मुख्यमंत्री के पास था, भारत के प्रधानमंत्री के पास वो कॉन्फ़िडेंस नहीं है । गुजरात के मुख्यमंत्री के पास वो कॉन्फ़िडेंस था क्योंकि गुजरात उनके साथ चल रहा था। गुजरात में इस साथ के कारण जो बनें वो भारत में बने नहीं और न बने वही अच्छा है,  स्वार्थ सर्वोपरि के बाद जाति सर्वोपरि के बाद और कुछ पड़ाव पार करने के बाद ही हिंदुओं के लिए राष्ट्र सर्वोपरि होता है,  बाकी मन को बहलाने के लिए राष्ट्र सर्वोपरि का नारा अच्छा है ।
एक बात अच्छी कहें या बुरी,  विकल्प की शक्ल में जो प्रस्तुत है वह भयावह है, इसलिए मोदी जी के 2019 के चांस बेहतर हैं । फिर भी हिंदुओं को 2019 में मोदी जी को वोट देना चाहिए ताकि 2024 तक काम करने का समय मिल सकें । बाकी मतदाता उपभोक्ता नहीं होता यह समझना आवश्यक है, और आज हम में से बहुत सारे उपभोक्ता मानसिकता से ही मोदी जी को नाप रहे हैं और इसी मानसिकता से उनको नापने को आपको प्रेरित किया जा रहा है कि हाँ ग्राहक राजा, यही नापदंड सही है ।
विधर्मी अपने लोगों को कैसे नापते हैं और उनकी सहायता करने में कैसे आगे बढ़ते हैं यह हम देखने को राजी नहीं हैं । उनको अभी सत्ता नहीं चाहिए,  बल्कि उनको अभी सत्ता से लाभ चाहिए ताकि वे सत्ता को चूस, निचोड़ सकें । उन्हें नौकरियाँ नहीं, योजनाएँ चाहिए ।
और आप को नौकरियों के ही पीछे कौन लगा दे रहे हैं यह भी देखिये ज़रा । जो नौकरी में हैं वे कॉर्पोरेट सेक्टर में होते आक्रमण का मूल्यमापन करें ज़रा । और बस कंधे उचकाकर यह न कहें कि मैं क्या कर सकता हूँ, यह तो सरकार का काम है । सच तो यह है कि आप अपनी चिंताओं को दूसरों के साथ शेयर करने से भी डरते हैं; कहीं आप को कम्यूनल सांघी घोषित न किया जाये,  आप की नौकरी पर खतरा न तौले ।
कम्युनिस्ट रशिया की जो स्थिति थी उसमें यहाँ के कम्युनिस्टों ने आप को ऐसे ही ला दिया है, बिना कम्युनिस्ट शासन के ।
इस्लाम से एक सीख लें - जहां खुद लड़ने न जाएँ वहाँ लड़नेवालों की हर तरहसे सहायता करें । इसमें अधिकतर सहायता की मांग आर्थिक ही होती है । यहाँ खुद से ही सवाल कीजिये । लोगों को गुंडों को हफ्ता देने में दिक्कत नहीं होती लेकिन अपनी संरक्षण के लिए व्यवस्था का भार सरकार पर ही डालेंगे । वोट किसलिए दिया है आखिर, है कि नहीं ?
लेकिन सामने जो लड़के डोले शोलेवाले दिखते हैं;  जिनपर आप की बेटियाँ ऊह आह करते हुए वारी जाती हैं, उनके बारे में कभी पूछा या सोचा है कि ऐसी बॉडी बनाने के लिए खुराक के पैसे उनके पास कहाँ से आते हैं ?  व्यायाम बिन पैसों का भी होता है, बिलकुल जिम बगैर भी, पर मसल्स अच्छे खुराक के बिना नहीं आते और अच्छा खुराक सस्ता नहीं होता। जब आप की लड़कियां उनके साथ भागती हैं तो आप को पता चलता है उन लड़कों के माली हालात का । लेकिन तब भी आप यह न पूछते हैं और न सोचते हैं कि बॉडी बनाने के पैसे कहाँ से आए थे उसके पास । और कभी यह भी सोचा कि पुलिस पर हाथ उठाने की हिम्मत कैसे आती है ?
बाकी मोदी को बिलकुल उसी सिक्ख लड़के की तरह खूंखार भीड़ का सामना अकेले और निहत्था करना चाहिए,  जो भी होगा, हम लोग बाद में यू ट्यूब पर देखेंगे, सही है ना ?
उम्मीद है आप शेयर करेंगे ।

साभार
श्री आनंद राज्याध्यक्ष

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