रविवार, 31 मार्च 2019

स्टॉकहोम सिंड्रोम और इस्लाम : न्यूजीलैंड से इस्लामिक राष्ट्र तक क्या कैसे

न्यूजीलैंड समेत योरोप के कई मुल्क में इस्लामी शरणार्थी समस्या का विषय आजकर जेरे-बहस है। भारत को मैं आज की चर्चा में इसलिए नहीं गिनता क्योंकि इस मुल्क के अंदर किसी भी मसले को लेकर हुक्मरानों में न तो स्पष्ट सोच है और न ही स्पष्ट भ्रम तो इनकी चर्चा बेकार ही है।
जो मुल्क़ शरणार्थी समस्या में घिरे हैं वहां की बहुसंख्यक अवाम स्पष्ट रूप से इससे चिढ़ी हुई है कि पीड़ित और मज़लूम बनकर आने वाले लोग उनके राजनीतिज्ञों की चिंतन धारा ही बदल दे रहे हैं और आश्चर्यजनक रूप से उनके हुक्मरान पूर्णतया जमीन में सर घुसेड़े शुतुरमुर्ग बन गये हैं।
न्यूजीलैंड का उदाहरण तो दुनिया आज देख रखी है पर ये तो नबबी सन 5 से चल रहा है जब नुबब्बत के पांचवें साल में हब्शा (Abyssinia) हिज़रत हुई थी। अरब में तब नया मजहब आकार ले रहा था और मक़्क़ा में नव-मुस्लिमों के ख़िलाफ़ वहां के स्थानिक लोगों में आक्रोश था जिसके चलते उन्हें अपने नये दीन के अनुपालन में दिक्कत हो रही थी। इस कारण नबी ने कुछ नए मुस्लिमों को हब्शा की ओर हिज़रत का आदेश दिया। तारीखों में आता है कि लगभग 83 मर्द और 18 नव-मुस्लिम औरतों ने हब्शा की ज़ानिब हिज़रत की।
हब्शा का बादशाह 'असमहा' ईसाई थे, आलिमे- दीन थे और बड़े रहम-दिल इंसान थे। वहां शरणार्थियों के रूप में पहुँचे मुसलमानों को उन्होनें सहर्ष अपने मुल्क में रहने-खाने की अनुमति और उनके दीन पर चलने की इजाज़त दे दी। इसी बीच मक़्क़ा के लोगों ने अमर बिन वलीद और उम्मारा बिन वलीद को अपना सफ़ीर बनाकर हब्शा भेजा ताकि वो हब्शा के बादशाह को इनका सच बचाकर आगाह कर सके।
अमर और उम्मारा ने जब बादशाह को सारी बातें बताई तो बादशाह ने उन सब शरणार्थियों को दरबार में आने का हुक्म दिया। शरणार्थियों की अगुवाई हज़रत अली के भाई हज़रत ज़ाफ़र कर रहे थे। जब ये शरणार्थी दरबार में हाज़िर हुये तो उनमें से किसी ने भी बादशाह को सिजदा नहीं किया। इससे उनके दरबारी बड़े आहत हुये और बादशाह से कहा कि ये तो आपकी शान में बेअदबी है। बादशाह ने जब ज़ाफ़र ने इसका सबब पूछा तो इसपे उनका जबाब आया- हमारे दीन में सिवाय ख़ुदा किसी और को सज़दा करने का हुक्म नहीं है।
उनके इस जबाब पर बादशाह ने उन सबको गिरफ्तार करने का हुक्म दिया और जब सिपाही उन्हें जकड़ने आगे बढ़े तो ज़ाफ़र कहने लगे- ऐ बादशाह! हमारे नबी ने हमसे कहा था कि चले जाओ हब्शा जहां एक नेक और सालेह बादशाह रहता है और हम इसी उम्मीद में हम यहाँ आये हैं कि आपके यहाँ अमनो-अमान से रखेंगे पर आप?
उनकी इस बात ने बादशाह को पिघला दिया और उसने ज़ाफ़र से कहा करीब आओ और अपना दीन बयान करो। ज़ाफ़र ने बादशाह को अपने दीन की अच्छी बातें समझाई और बादशाह मुत्तासिर हो गया। उसके बदले रूप को देखकर अमर बिन वलीद ने बादशाह को समझाने की कोशिश की कि आप गुमराह हो रहे हो जबकि ये तो वो लोग हैं जो आपके मसीह और उनकी अम्मा के बारे में बुरा कहते हैं। बादशाह ने फिर से ज़ाफ़र से पूछा कि क्या कहता है तुम्हारा दीन हमारे मसीह के बारे में? ज़ाफ़र ने फिर से बड़ी स्पष्टता के साथ अपनी बात रखी तो बादशाह उसका मुरीद हो गया।
इसके बाद पहले तो बादशाह ने अमर बिन वलीद को उसके लाये तमाम तोहफों के साथ वापस भेज दिया फिर ज़ाफ़र के मज़हब की तारीफ में कसीदे पढ़े और हुक्म दे दिया कि इन्हें पूरा अख्तियार है कि वो उसके हुकुमत में जहाँ चाहे, जितने दिन चाहें और जैसे चाहे रहें।
कहने की जरूरत नहीं है कि बादशाह का ये फैसला उसके मुल्क के ईसाई पादरियों और आम जनता को बड़ा नागवार गुजरा पर राजा जिस रास्ते पर चल दे प्रजा भी उसी राह की अनुगामी हो जाती है ये शास्त्र वचन है। दुनिया के देशों में हब्शा (वर्तमान इथियोपिया) संभवतः उन पहले देशों में था जिसने ईसाईयत को राजकीय मजहब के रूप में स्वीकार किया था पर अपने बादशाह के "स्टॉकहोम सिंड्रोम" के चलते आज उनकी आधी आबादी इस्लाम में है।
किसी बादशाह के लिए इससे अधिक खतरे की बात क्या होगी कि उसे कोई शरणार्थी सिजदा न करे और जब उससे सफाई मांगी जाये तो स्पष्टता से जबाब भी दे। वो "स्टॉकहोम सिंड्रोम" ही था जिसने सजदा न किये जाने और उसके अपने मजहब की मज़म्मत किये जाने और भी बरहम नहीं होने दिया। ये स्टॉकहोम सिंड्रोम का ही असर था जिसने अमर बिन वलीद जैसे ख़ैर-खाहों को बाहर का रिश्ता दिखा दिया।
अपने विरोधियों से जीतने या विरोधियों को जीतने में "स्टॉकहोम सिंड्रोम" उनका सबसे बड़ा हथियार है। शरणार्थी होने के बाबजूद चीजें अपनी शर्तों पर मानना, बर्बादी के मरहले पर खड़े होने के बाबजूद अपने अक़ीदों पर पुख़्तगी से डटे रहना और हर हालत में दीन की दावत देने की ज़िद शत्रुओं के मन में एक अलग ही असर करता हूं जिसे 1400 साल पहले ज़ाफ़र से लेकर आज चौदह सौ साल बाद ज़फर तक बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं और यही "स्टॉकहोम सिंड्रोम" आज न्यूजीलैंड और योरोप के तमाम ईसाई मुल्कों में भी असर कर रहा है। शत्रुओं के प्रभाव में आकर अपने ही लोगों से कतअ-ताअल्लुक कर लेना इसी स्टॉकहोम सिंड्रोम का असर है।
ऐसे में किसका क्या और कितना बचेगा ये कह नहीं सकते और अपने भारत के लिए बिल्कुल भी नहीं। सूरह फ़तह की 28वीं आयत मेरे नज़र के सामने बार-बार आ जाता है।
नोट- स्टॉकहोम सिंड्रोम के बारे में Anand Rajadhyaksha जी कई बार और काफी कुछ लिख चुके हैं और इस मानसिकता को राजीव मिश्रा ने कई बार समझाया है।

साभार
अभिजीत सिंह