बुधवार, 27 मार्च 2019

ये युद्ध नही आसान | थोड़ा ठहर मेरी जान

#युद्ध_क्या_हलुआ_है_बे!!!
Steven Spielberg अपने फन के सबसे बड़े उस्ताद हैं अगर सिनेमा देखते हैं तो इस बंदे की फिल्मों को नहीं देखा.... तो कुछ नहीं देखा एक से एक बेहतरीन फिल्में गजब का क़िस्सागोई का हुनर..... पर अगर Steven Spielberg की फिल्मों में भी सर्वश्रेष्ठ चुनने को कहा जाए तो वो है #Saving_Private_Ryan दूसरे महायुद्ध की एक घटना को आधार बना रचा गया एक सिनेमा...... #युद्ध_क्या_छीनता_है, क्या देता है... क्या होती है उनकी विभीषिका समझना है तो ये फ़िल्म देखिए..... देखिए और कल्पना कीजिये उस सैनिक की मनोदशा की जो युद्ध में उतरता है...... सत्य यही है के उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते!
जब कैप्टन मिलर प्राइवेट रयान को खबर देता है उसके सारे भाई युद्ध में मारे जा चुके हैं इस लिए सरकार उसे वापस भेज रही है... वो अपनी पोस्ट अपने साथियों को छोड़ कर तब तक जाने से मना कर देता है जब तक रीइन्फोर्समेंट नहीं आ जाती..... लेकिन जब जर्मन अटैक होता है और सारे मारे जाते हैं वो घुटनों में हाथ बांध कांपता हैं.... वहीं मिलर जो गोलियों से छलनी पड़ा अंतिम सांस ले रहा है अपना प्रतिकार नहीं छोड़ता जर्मन टैंक पर अपनी पिस्तौल से गोलियां चलाता है.... जानता है टैंक का कुछ नहीं बिगड़ना... पर जिद्द हैं बिना लड़े तुम मुझे रौंद आगे नहीं बढ़ पाओगे...!
युद्ध भावनाओं से परे एक भयावह सत्य है जहाँ  विजय के उत्सव में अक्सर वो शामिल नहीं होते जिनके सर विजेयता का ताज़ होना होता है....
और पीछे छूटते हैं बुजुर्ग माएँ, विधवा पत्नियां, दुधमुंहे बेटे, नादान बेटियाँ...... विजय के जश्न का शोर जैसे ही मद्धम पड़ता है इन्ह भुला दिया जाता है..... एक मन को तसल्ली देते गर्व और चंद पैसों के साथ....
लेकिन वो गर्व पिता की जगह स्कूल बस तक छोड़ने नहीं जाता, वो गर्व वो ताक़त नहीं देता जो एक पिता की मौजूदगी देती है....... और पैसों की छीना झपटी के लिए तो कई बार विधवाओं के ससुराल और मायका पक्ष तेरवीं तक इंतज़ार तक नहीं कर पाते..... हाँ में भी आक्रोश में हूँ पर उन्माद का शिकार नहीं...... और जो उन्माद का या राजनीतिक विरोध प्रतिरोध का शिकार हैं उनसे पूछना चाहता हूं..... कितनी जिम्मेदारी उठाएंगे युद्ध हुआ तो उसके बाद कि विभीषिका की... 10 रुपये चीनी मंहगी हुई तो देशभक्ति चूतड़ों में घुस जाएगी और बातें ऐसी जैसे जाने कितने बड़े वॉर लार्ड हों।।
में उस गांव में रहता हूँ जहां हर घर से कोई न कोई फौज में है जब युद्ध छिड़ता है परिजन TV पर वीरगती पाए लोगों के नाम में अपनों का नाम ढूंढते हैं और ईस्वर को धन्यवाद देते हैं.... नाम न होने पर.....!
आपने PVC विक्रम बत्रा की प्रेमिका के विषय में सुना होगा....... उन्होंने विक्रम के बाद विवाह नहीं किया था........आईये मिलवाता हुँ कलावती नाम की एक वृद्धा से 1965 के युद्ध में पति लापता हुआ शादी के बाद गौना नहीं हुआ था पति का चेहरा भी ढंग से याद नहीं उन्ह तब 17-18 की उम्र थी आज 54 साल बीत चुके हैं...... सरकार ने उन्ह शहीद की विधवा मान लिया पर वो आज भी सुहागन हैं उनका यक़ीन आज भी अपने पति को जिंदा मानता है..... 54 साल का वक़्त उनके यकीन को नहीं तोड़ पाया...... है हिम्मत तो आओ और उन्ह यक़ीन दिलवाओ के अब वो विधवा हैं इंतज़ार करना छोड़ दें...
युद्ध सिर्फ एक सैनिक की जान नहीं लेता उसकी कीमत बहुतों को अदा करनी पड़ती है... बड़ी कीमत!!
#कार्यवाही_होनी_चाहिए_और_होगी, युद्ध अनिवार्य हुआ तो होगा...... पर इसे तय करने का हक़ सिर्फ उनको है जो युद्ध लड़ेंगे.... जो जान दाव पर लगाएंगे....... जिसे ज्यादा जल्दी है खुद क्यों नहीं चला जाता पाकिस्तान घुस जाओ कराची मैं बम लेकर जैसे वो घुसते हैं..... बम बनाना नहीं आता हो में सिखा दूंगा.... कई आर्मी के एक्सपर्ट हैं गांव में...... अगर पिछाड़ी में इसका गुदा नहीं है..... तो मुंह भी बंद रखो और इंतज़ार करो..... जिनका ये काम है उन्ह उनके हिसाब से करने दो!
लेखक: अजय सिंह