सोमवार, 1 अप्रैल 2019

ईसाइयत बनाम इस्लाम

#इस्लाम_व_पश्चिम_के_बीच_हिंदुत्व_का_भविष्य
न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आरडर्न ही नहीं बल्कि पूरे इस्लाम के प्रति पश्चिमी जगत की हरकतें देखकर मेरे मन में द्वैत उत्पन्न हुआ है कि परदे के पीछे कोई और खेल चल रहा है या वास्तव में जो दिख रहा है वही सही है?
यूरोपियन जातियों के युयुत्सु इतिहास, नीचता की हद तक पहुँची हुई कुटिल मेधा और दूरदर्शी चिंतकों की बड़ी संख्या को देखकर जो हो रहा है उसपर विश्वास  करने को मन नहीं करता ख़ास तौर पर जबकि सैमुअल हटिंगटन बीस साल पहले ही “द क्लैश ऑफ सिविलाइज़ेशन...” में इस्लाम और ईसाइयत के बीच संघर्ष की भविष्यवाणी कर चुके थे। यहाँ पर सभी जान लें कि आज भी अमेरिका व पश्चिम में नीतियों का निर्माण वहाँ के बुद्धिजीवी करते हैं राजनेता नहीं, राजनेता तो उसे लागू भर करते हैं।
तो फिर क्या यूरोपीय थिंक टैंक पागल है जो इस्लाम और ईसाइयत के बीच की एतिहासिक ख़ूनी प्रतिद्वंदिता, इस्लाम की सर्वभक्षी प्रवृत्ति को जानकर भी और चर्च के विरुद्ध जाकर भी मुस्लिम शरणार्थियों को यूरोप, ऑस्ट्रेलिया व न्यूज़ीलैंड में आने देने के पक्ष में आंदोलन चला रहा था?
तो बात इतनी सीधी लगती नहीं ज़ितनी सीधी दिख रही है।दर असल पश्चिम उसी उपलब्धि से हार रहा है जिसके लिये उसने शताब्दियो तक मानवता का ख़ून बहाया और वो है ‘दौलत’।आज पश्चिम के पास पूरी पृथ्वी के अधिकतम संसाधन हैं जिसने उनका जीवन विलासिता से भर दिया है। आज वे एक बहुत शांत, सुशील व समृद्ध समाज हैं। लेकिन यह शांति व समृद्धि अपने साथ दो अभिशाप भी लाई है।
प्रजनन दर में कमी और जीवन में भयंकर ऊब।
एक ओर स्केंदेनेवियन देश, फ़्रांस, जर्मनी आदि सभी देश बुढ़ा रहे हैं क्योंकि लोगों को विवाह और बच्चों में रुचि ही नहीं जिसके अपने ‘गहन जैविक कारक’ हैं तो दूसरी ओर संघर्ष के अभाव ने लोगों में जीवन के प्रति इतनी ऊब पैदा कर दी है कि लोग आत्महत्या कर रहे हैं, स्विट्ज़रलैंड इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है।
अमेरिका इस स्थिति से कुछ हद तक बचा हुआ है क्योंकि वह जानता है कि शीर्ष के बाद ढलान शुरू होती है इसीलिये उसके थिंक टैंक व सत्ता संस्थान अपने समाज को कभी भी शीर्ष पर होकर भी शीर्ष का अनुभव नहीं होने देते और समाज को व्यस्त रखने हेतु चुनौतियों व संघर्ष के नये नये क्षेत्र ढूँढते हैं। पहले नाजीवाद, फिर साम्यवाद वर्तमान में इस्लाम और भविष्य में चीन।
पश्चिमी राजनीतिक प्रतिष्ठान सीधे सीधे इस संघर्ष में उतरने में सक्षम नहीं क्योंकि अब वहाँ कोई सैनिक बनने के लिये तैयार नहीं और इसीलिये संभवतः उन्होंने ‘मुस्लिमों’ के रूप में ‘संघर्ष’ ख़ुद उनके घर में बुलाया है ताकि उनके नागरिक संघर्षशील बनें और उनमें जुझारू क्षमता विकसित हो। स्पेन ने साँड़ों के युद्ध जैसे रक्त रंजित खेलों के ज़रिए अपने नागरिकों को जुझारू बनाये रखा है और इसलिये उसने मुस्लिमों के लिये अपने दरवाज़े नहीं खोले हैं जबकि सबसे ज़्यादा ह्रास हुआ है जर्मनों की युद्ध प्रवृत्ति का क्योंकि यहूदी प्रचार तंत्र द्वारा हिटलर के विरुद्ध किये घनघोर नकारात्मक प्रचार ने जर्मन पीढ़ियों को गहरे अपराधबोध में धकेल दिया और उनके भीतर के योद्धा को मार दिया। आज जर्मन जाति मध्यमवर्गीय हिंदुओं के बाद संसार की सबसे कायर जाति है। शायद इसीलिये जर्मन सत्तातंत्र ने सीरियाई मुस्लिमों के लिये अपने दरवाज़े सबसे ज़्यादा खोले हैं कि मुस्लिमों के काले कारनामों से उनमें असुरक्षा जागे और वे कुछ हिंसक बनें।
वहीं दूसरी ओर न्यूज़ीलैंड के सत्ता प्रतिष्ठान की हरकतों को देखकर मन मे  दूसरा पक्ष भी उभरने लगता है कि वे अपनी ‘सभ्य छवि’ में ‘नारसासिस्टिक’ हद तक इतना डूब चुके हैं कि आक्रांताओं के विरुद्ध प्रतिकार से भी उन्हें अपनी शांति भंग होने डर लगता है और निरीहतापूर्ण ढंग से अपनी आत्मप्रताड़ना का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं। शायद यहाँ भी कृष्ण का कर्मफल सिद्धांत दोहराया जा रहा है। कभी यूरोपीयों से माया और इंका सभ्यताओं’ ने समर्पण और दैन्य द्वारा शांति ख़रीदनी चाही पर बदले में उन्हें मिले नरसंहार और अब लगता है पश्चिम की बारी है।
भारत का हिंदू मध्यम और उच्च वर्ग न्यूज़ीलैंड के विलासी और भोगवादी कायर समाज का प्रतिरूप है जो इसलिये शांति नहीं चाहता कि यह कोई वाक़ई शांति के पुजारी हैं बल्कि यह वर्ग शांति सिर्फ़ इसलिये चाहता है ताकि येन केन प्रकरण जो एश्वर्य अपने ग़रीब बंधुओं के ख़ून को निचोड़कर प्राप्त किया है उसे निर्बाध रूप से भोग सके।
इस वर्ग को गृहयुद्ध की आहट साफ़ साफ़ सुनाई दे रही है और इसलिये ये शतुर्मुर्ग शांति के पुजारी बन गये हैं ताकि युद्ध को अधिकतम समय के लिये टाला जा सके और ये कुछ रातों को और रंगीन कर सकें। उन्हें पता है कि  मुस्लिमों के काले कारनामों को उजागर करने से ना केवल सऊदी फ़ंडिंग बंद हो जायेगी बल्कि मुस्लिमों की प्रतिक्रिया इस युद्ध को और नज़दीक कर देगी।युद्ध के इसी डर से  धर्मनिरपेक्षता का जाप यही अंगरेजीदां वर्ग तथा उसकी औलादें, महानगरीय संस्कृति से प्रदूषित नपुंसक लड़के व चरित्रहीन लड़कियाँ सबसे ज़्यादा करतीं हैं और इन चमकते दमकते अंग्रेज़ी टोन में गिटपिट करते वर्ग को देखकर निचला मध्यम वर्ग अपने गहन हीनताबोध में धर्मनिरपेक्षता को प्रगतिशीलता और आधुनिकता का पर्याय समझकर उनकी भोंडी नक़ल करता है।
पश्चिम तो अपने शक्तिशाली बुद्धिजीवी वर्ग और तकनीकी श्रेष्ठता के बल पर इस्लाम को कुचल देगा, जैसे अतीत में स्पेन में कुचला था पर समस्या तो अपने यहाँ है। हिंदूओं में छात्र जीवन में एक गर्लफ़्रेंड-बॉयफ़्रेंड  की खोज और शराब के नशे में हुल्लड मचाते टीन एजर्स की देशभक्ति सिर्फ़ ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ तक सीमित है और ‘हिंदुत्व’ शब्द तो उनके लिये ‘बैकवर्डनैस’ और ‘कम्यूनलिज्म’ की निशानी है। यह युवा वर्ग कॉलेज पास आउट करने के बाद आँखों पर धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशीलता की पट्टी बाँधे एक अदद व्हाइट  कॉलर जॉब की प्राप्ति को दुनियाँ की सबसे बड़ी उपलब्धि मानता है।दूसरी ओर है एक निहायत असफल, कुंठित और कमजोर मस्तिष्क का हिंदू युवा जो सिर्फ़ अपनी कुंठा में ‘कट्टर हिंदू’, ‘कट्टर सनातनी’ जैसे भड़कीले टाइटलों के साथ हिंदुत्व का पैरोकार बनने का दम भरता हैं। यह वर्ग औरभी बुरा है और इसे और इसकी फ़ूहड़ हरकतों व अश्लील गालियों-हरकतों को वामपंथी और मुसलमानहिंदुत्व का फ़ासीवादी चेहरा बनाकर पेश करते हैं। आप किसी वामी या मुस्लिम के पेज पर सभ्य व तार्किक बहस कीजिये, वे आपको ब्लॉक कर देंगे लेकिन गालीबाज  हिंदुओं को कभी भी ब्लॉक नहीं करते क्योंकि उन्हें इन्हीं को हाईलाइट कर हिंदुत्व को बदनाम कराना होता है।इन्  हिंदू युवकों को कुछ सिखाया भी नहीं जा सकता क्योंकि उसके लिये उनमें मस्तिष्क क्षमता है ही नहीं।
पर पूर्ण दोषी ये भी नहीं। दोषी हैं धर्म व हिंदुत्व के नाम पर हराम की रोटी तोड़ते साधुओं-सवादुओं, स्वरूपानंद जैसे चरबीगोलों और आसारामों व ढोलकीनंदनों की फ़ौज का जो सिर्फ़ अपने अंधानुयायी बनाकर जडमूर्ख बनाने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं करते।
इन दो दशकों में अपने ‘बत्रा छाप चिंतकों’ के कारण इस महानगरीय युवावर्ग में संघ भी अपनी पहुँच बनाने में असफ़ल रहा है।
फिर उपाय क्या है?
उपाय है #स्वाध्याय। ज़रूरी नहीं कि आप पुस्तकें ही पढ़ें।
जो इस विषय में जानते हैं उनसे  चर्चाएँ करें, संगोष्ठियाँ आयोजित करें,
-आप हिंदू महानायकों पर आधारित नई पुरानी फ़िल्में देखें, बच्चों  को दिखाएँ, वीरत्व का संगीत बजायें,
-गीताप्रेस की ’वीर बालक’ व ‘वीर बालिकाओं’ जैसी छोटी पुस्तिकाओं को वितरित करें, बच्चों के सामने उनका वाचन करें।
-अंग्रेजी मीडियम और क्रिश्चियन स्कूलों में पढ़ रहे अपने बच्चों को अंग्रेजी वाली #अमर_चित्र_कथा दें और उनसे पढवाएं व खुद अर्थ पूछें।
-अपने, परिवार  के सदस्यों के हाथ पर हर महीने नया कलावा बाँधें।
-घर में ड्राइंग रूम में भारत माता व अखंड भारत का नक़्शा लगायें।
-ड्राइंग रूम में दो तलवार और ये  ना हो सके तो कम से कम  तलवार व ढाल वाले ‘वॉल हैंगिंग्स’ से सजायें।
-प्रतिदिन और अगर संभव ना हो तो प्रति पूर्णिमा व हिंदू पर्व पर तथा एयर स्ट्राइक जैसे मौक़ों पर घर में आरती करें व बच्चों सहित शंख बजायें।
-त्योहारों पर अपनी छत या बालकनी या पार्क में शंखध्वनि के साथ अपने बच्चों के हाथों भगवा सूर्यध्वज लहरायें।
यक़ीन मानिये आप सच्चे हिंदू योद्धाओं की अगली पीढ़ी खड़ी कर देंगे जो शस्त्र व शास्त्र दोनों के महारथी होंगे।
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Note:इन सारे कार्यों का स्वयं परीक्षण करके ही आपको बता रहा हूँ।
साभार
देवेंद्र शिकरवार

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