शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

भारत की दुर्दशा की जवाबदार कांग्रेस है

भारत ने पाकिस्तान से चार युद्ध लड़े। १९४७, १९६५, १९७१, १९९८ का कारगिल युद्ध। ध्यान देने की बात यह है कि तीन युद्ध कांग्रेस राज में लड़े गए और कारगिल युद्ध भाजपा के समय। कांग्रेस के समय लड़े गए युद्ध में भारत जीत तो गया और जिसका झुनझुना हम आज तक बजा रहे हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि इन विजयों के बावजूद भारत को मिला कुछ नहीं।
१९४७-४८ के युद्ध में हमारे हाथ से कश्मीर गया। प्रधानमंत्री थे पंडित नेहरू और उनका बोया आज तक हम काट रहे हैं।
१९६५ में लाहौर तक पहुंच कर भी हमें कुछ नहीं मिला बल्कि ताशकंद में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हुई हमारे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की १० जनवरी १९६६ को। यह समय अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शीतयुद्ध का था और न्युक्लीयर आर्म्स रेस का था और भारत का नाभिकीय कार्यक्रम शुरू हो चुका था लाल बहादुर शास्त्री जी के नेतृत्व में। इस कार्यक्रम को होमी जहांगीर भाभा ने संभाला जो उस समय के विश्व के सर्वश्रेष्ठ नाभिकीय वैज्ञानिकों में अग्रणी थे। उनकी भी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो जाती है शास्त्री जी के मृत्यु के मात्र दो हफ्तों के अंदर, २४ जनवरी १९६६ को।
१९७१ का युद्ध भी हम लड़े पाकिस्तान दो टुकड़ों में कटा और एक करोड़ शरणार्थियों को शरण दी भारत ने। लेकिन भारत को मिला क्या? बंगलादेश आजाद हुआ और शरणार्थियों की समस्या आज नासुर बन गई है हमारे लिए। द्वितीय यह है कि भारत खगोल विज्ञान के जनक डॉ विक्रम साराभाई की रहस्यमई मौत हुई। ध्यान देने वाली बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शीतयुद्ध अपनी ढलान पर था और विश्व में चल रहा नाभिकीय संकट या न्युक्लियर आर्म्स रेस खत्म हो चुका था और 'स्टार वार्स' का दौर शुरू हो चुका था। इस क्षेत्र के अग्रणी खगोल वैज्ञानिकों में डॉ विक्रम साराभाई भी एक थे।
गौर करने की बात यह है कि जब कोई राष्ट्र युद्ध जीतता है तो जो संधि पर हस्ताक्षर किया जाता है वह विजयी राष्ट्र के शर्तों पर होता है। तीसरी बात ध्यान देने वाली यह है कि ६५ में इंदिरा गांधी एक महत्वपूर्ण मंत्रालय में मंत्री थीं, सुचना और प्रसारण मंत्रालय। १९७१ में वह खुद प्रधानमंत्री थीं।
तो क्या इंदिरा गांधी भारत विरोधी शक्तियों के एजेंट के तौर पर कार्य कर रही थीं? तीनों रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु के समय और बाद सत्ता की डोर इंदिरा गांधी के हाथ में थीं और इन रहस्यों पर से पर्दा उठाया जा सकता था लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
१९९८ में कारगिल युद्ध भाजपा के समय में लड़ा गया, हम जीते और युद्ध के पहले वाली यथास्थिति बरकरार रही। मतलब कि हम खोए कुछ नहीं।
तो ऐसा क्या था कांग्रेस के नेतृत्व में लड़े गए युद्ध में हमने खोया ही केवल और भाजपा के नेतृत्व में हमने यथास्थिति बरकरार रखी। उरी और बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक पर कांग्रेस के दिल में दर्द होना और सुबुत मांगना इसका नया उदाहरण है और प्रमाण भी है।

भारत माता की जय
बेबाकबनारसी

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