सोमवार, 1 अप्रैल 2019

राहुल गांधी की 72 सालाना गरीबो के लिए एक धोखा है

राहुल की घोषणा का कोई महत्त्व नहीं है क्योकि भारत गरीबी उन्मूलन के कगार पे खड़ा है.
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द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कई राष्ट्र जो आर्थिक विकास के स्तर पर भारत के समकक्ष थे, हमें पछाड़ते हुए तेजी से प्रगति कर गए. अमेरिका, चीन और रूस को छोड़कर बहुत से देश भारत के दो-तीन जिले के बराबर थे. जनसँख्या के मामले में तो कहीं ठहरते ही नहीं थे. चीन, रूस और सिंगापुर को छोड़कर, सभी विकसित राष्ट्रों ने लोकतंत्र को अपना लिया. इन सभी राष्ट्रों की समृद्धि का प्रमुख स्रोत तेल के कुएं नहीं थे. न ही अधिकतर देशो में अंग्रेजी बोली जाती थी.
इसके विपरीत भारत ने स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र अपनाया, इंग्लैंड में पढ़े नेहरू और उनके परिवार के नेतृत्व में विद्वानों और नौकरशाहों ने राष्ट्र को दिशा निर्देश दिया. आपातकाल का लाभ उठाकर राष्ट्र को सेक्युलर और समाजवादी भी बना दिया.
लेकिन फिर भी न तो गरीबी दूर हुई, न ही कृषको को समृद्धि मिली, न ही समाजवाद मिला और दंगे एवं आतंकी हमले होते रहे.
अधिकतर जनसँख्या - 90 प्रतिशत से भी अधिक - गन्दगी, अँधेरे, मंहगाई, अभाव और भ्रष्टाचार में रहने को अभिशप्त थी. रेल टिकट से लेकर कुकिंग गैस, पेंशन, राशन, मार्कशीट का सत्यापन, सब में घूस देनी पड़ती थी. किसी भी उद्यम को लगाने में बीसियों क्लीयरेंस, परमिट और भाग-दौड़ की आवश्यकता थी.
एक तरह से हमने "जुगाड़" और "सब चलता है" के जुमलों से जीना सीख लिया था.
"प्रगतिशील", "भारत रत्न" नेहरू, इंदिरा, राजीव, सोनिया सरकारों के बावजूद सब के सब भीषण गरीबी से जूझ रहे थे.
भारत की दरिद्रता और पिछड़ेपन का केवल एक कारण था: इन भारत रत्नो ने जनता और गरीबो का भला नहीं, सिर्फ और सिर्फ अपना और अपने परिवार के सदस्यों का भला किया है.
वोट गरीब से मांगे, वोट दलित से मांगे, वोट पिछड़ों से मांगे, उनके नाम पर सरकार बनाकर उन्‍होंने अपनी तिजोरियां भर ली. इसके सिवा कुछ नहीं किया.
इन भारत रत्नो से प्रेरणा लेकर लालू, अखिलेश, मायावती इत्यादि ने भी समाजवाद और सेक्युलरिम के नाम पे अरबो की सम्पत्ति बना ली.
आजकल जो कभी एक-दूसरे को देखना नहीं चाहते थे, पसंद नहीं करते थे, वो अब एकसाथ. अपने स्‍वार्थ के लिए यह सभी परिवारवादी पार्टियां मिल करके अब जनता के विकास को रोकने पर तुले हुए हैं; उन्हें सशक्त होने से रोकना चाहते हैं. उस अभिजात वर्ग को पता है कि अगर गरीब, किसान, दलित, पिछड़े सशक्‍त हो गए तो उनकी दुकानें हमेशा के लिए बंद हो जाएगी.
भारत रत्नो और इनके सेक्युलर फॉलोवर्स ने जनता को लॉलीपॉप (फ्री बिजली, पानी और लागत से कम रेल और बस टिकट इत्यादि) और स्लोगन (सामाजिक न्याय; धर्मनिरपेक्षता; आरक्षण इत्यादि) के द्वारा मूर्ख और जानबूझकर दीन-हीन और गरीब बनाये रखते है जिससे वे "मूर्ख" कुछ टुकड़ो के लिए उस अभिजात वर्ग को सत्ता में बनाये रखते है.
भले ही बिजली 12 घंटे न आये; पानी की पतली धार, वह भी गन्दा, सिर्फ एक घंटे; खचड़ी बस; गन्दी, रेंगती हुई रेल; सामाजिक न्याय के नाम पे परिवादवाद; धर्मनिरपेक्षता के नाम पे तुष्टिकरण; सिर्फ यही नियति रह गयी थी.
इसी कड़ी में राहुल ने घोषणा कर दी कि वे परिवार जिनकी आय 12,000 रुपये प्रति माह से कम है, ऐसे 5 करोड़ गरीबों को 6000 रुपए प्रति माह की सब्सिडी दी जाएगी, जो 72,000 रुपये सालाना होगी.
इस घोषणा का कोई महत्त्व नहीं है.
प्रतिदिन 123 रुपये (2011 की कीमत के अनुसार) से कम पे गुजारा करने वाले भारतीय को विश्व बैंक गरीबी रेखा के नीचे या भीषण गरीबी में रहने वाला मानता है. यानि कि गरीबी रेखा के नीचे एक पांच सदस्य परिवार की आय 18450 रुपये प्रति माह से कम होनी चाहिए.
विश्व बैंक के अनुसार इस वर्ष भारत से भीषण गरीबी समाप्त हो जायेगी (पहली नवंबर को भारत की जनसँख्या का केवल 3 प्रतिशत या लगभग ४ करोड़ लोग भीषण गरीबी में रह जाएंगे, जिसे विश्व बैंक गरीबी समाप्त होना मानता है). अगले दो वर्षो में यह संख्या एक करोड़ के नीचे हो जायेगी. और यह बात भारत सरकार ने विश्व बैंक को नहीं बतायी है, बल्कि विश्व बैंक की "निर्धनता मापने की घड़ी" कह रही है. जब मोदी सरकार सत्ता में आयी थी, उस समय 20 करोड़ से अधिक भारतीय भीषण गरीबी में रह रहे थे.
इस उपलब्धता का श्रेय मोदी सरकार के समय में हुए तेज विकास और स्वच्छ प्रशासन को जाता है.
प्रधानमंत्री मोदी ने निजी क्षेत्र और उद्यमशीलता को बढ़ावा दिया है, मुद्रा लोन की योजना चलायी, 59 मिनट में लोन की स्वीकृति की व्यवस्था की जिससे निजी क्षेत्र में रोजगार बढ़े. GST के द्वारा टैक्स दरों में पारदर्शिता आयी जिससे चुने हुए उद्योगपतियों को लाभ ना मिले.
प्रधानमंत्री मोदी भारत की भ्रष्ट संरचना को बदल रहे हैं. उस संरचना को जिससे भारत रत्नो और उनके मित्रो ने आम भारतीयों का शोषण करके अपने परिवार और खानदान को राजनैतिक और आर्थिक सत्ता के शीर्ष पर बनाए रखा था.
प्रधानमंत्री मोदी ऐसी व्यवस्थाओं को तोड़ रहे हैं, खत्म कर रहे हैं, जिन्होंने दशकों से देश के विकास को रोक रखा था.
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साभार
अमित सिंघल

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