शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

सालाना 72 हजार मालामाल वीकली टाइप योजना है

"मालामाल वीकली" टाइप यह जो योजना है काँग्रेस की, अगर इसकी घोषणा काँग्रेस ने मोतीलाल वोरा अथवा मनमोहन सिंह जी से करवा दी होती तो मैं इसे एकबारगी सच भी मान लेता क्योंकि वोरा जी जहाँ जीवन भर कैशियर रहे हैं काँग्रेस पार्टी में, पैसों की अहमियत समझते हैं वहीं मनमोहन सिंह जी भी देश के सिर्फ पीएम नहीं बल्कि वित्त मंत्री, वित्त सचिव और आरबीआई गवर्नर तक रहे हैं, इस नाते वे भी बेहतर जानते हैं कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते, जैसा कि उन्होंने एक बार कहा भी था।
पर इस स्कीम की घोषणा जबकि राहुल गाँधी ने की है तब मुझे नहीं लगता कि कोई भी सामान्य और होशमंद इंसान राहुल गाँधी के 72000 के शिगूफे पर भरोसा करेगा, क्योंकि यह आदमी एक 'सर्टिफाइड मसखरा' है।
हालाँकि मैं इस बात को यूँ भी कह सकता था कि "राहुल गाँधी एक सर्टिफाइड मसखरे हैं", लेकिन इस दुनिया में मेरा जिन दो लोगों को कतई इज़्ज़त देने का मन नहीं करता उनमें केजरीवाल के अलावा दूसरा बन्दा राहुल गाँधी ही है।
यह व्यक्ति भोला होता, मासूम होता या मूर्ख भी होता, तो चल जाता पर यह धूर्त है। और एक वर्ग विशेष के लिए क्यूटनेस का चोला ओढक़र उन्हें ठग रहा है।
मैं राहुल गाँधी का यकीन कर लेता, अगर इस आदमी ने अपने पूरे जीवन में 12000 रुपये भी अपनी मेहनत से कमाए होते, मैं यकीन कर लेता इस आदमी का अगर इसने UPA सरकार के दस साल के दौरान किसी अहम मंत्रालय अथवा योजना की जिम्मेदारी लेकर जनकल्याण का कुछ कार्य किया होता, अपना योग्यता साबित की होती।
मैं यकीन कर लेता इस व्यक्ति पर अगर इसने अपने 15 साल के संसदीय कार्यकाल में अमेठी में जनभागीदारी/जनसहभागिता से कुछ ऐसा जमीनी कार्य किया होता जो बाकी देश के लिए मिसाल बनता लेकिन जब इस आदमी के पास सत्ता और ताकत थी तब यह इंसान जिम्मेदारियों से भागता रहा।
जब इसको संसद में जनता की आवाज बनना था यह पीछे की बेंचों पर बैठ कर ऊँघता रहा, जब इस आदमी को देश का विश्वास हासिल करना था तब यह इटली, अमेरिका और थाईलैंड घूमता रहा।
और आज जबकि इस आदमी का ख़ानदानी पेशा "राजनीति और सत्ता" मेहनतकश मोदी की वजह से खतरे में पड़ गए तो यह जुआरी की तरह बड़ी-बड़ी बाजियाँ लगाने लगा। जिसे यह नहीं पता कि मैं जो कह रहा हूँ, वह कहाँ से मैनेज होगा ? आप प्रधानमंत्रियों के खानदान से आते हो, आप देश के 140 करोड़ लोगों से मुख़ातिब हो; आपको लगता है कि यह मजाक और ड्रामा हो रहा है!
और मान भी लीजिये आप इस झाँसे के साथ सत्ता में आ भी गए, तब इस वादे को पूरा न कर पाने की स्थिति में क्या दाँव चलोगे ?
जब आप देश को एक सराय और धर्मशाला की तरह समझते ही हो तो क्या गारंटी है कि उत्पन्न हालात में आप देश को भी दाँव पर नहीं लगा दोगे, देश को भी दुनिया के किसी धन्ना सेठ राष्ट्र में आगे गिरवी नहीं रख दोगे !
और ऐसा न सोचने की कोई वजह भी तो नहीं है। आपका इटली में ननिहाल है। लंदन की हर चौथी गली में जीजी और जीजाजी के बंगले हैं, इसके अलावा जितने भी भगौड़े काँग्रेस के जमाने में देश का पैसा लेकर भागे हैं, वह भी तो विदेशों में आपके लिए पलक-पाँवड़े बिछाकर बैठे हैं। तब आपका क्या भरोसा; बिना झोला उठाए ही देश से निकल लोगे ।
इसलिए जिन लोगों के बारे में भी आपको लगता है कि उनकी आत्मा के ऊपर 'राहुल' नामक जिन्न सवार हो सकता है उन्हें 'जानकारी' और 'समझदारी' के छींटों से होश में लाइए। देशहित में हम सबके ऐसे प्रयासों की आज नितान्त आवश्यकता है।

अरविन्द शर्मा जी के शब्द मेरे स्वयं के भी समझें।

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