शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

कहानी मेंढकी और बिच्छु की

एक मेंढकी जंगल में से टनाटन कूदती अपने घर जा रही थी.अचानक रास्ते में एक छोटी सी नदिया आ गयी. अब मेंढकी ही थी तो पानी से क्या डर ? कूदने की तैयारी में थी तो अचानक उसे एक करूण  पुकार सुनाई दी.
"हे दयावती, क्या आप इस नदिया को पार करने में मेरी सहायता कर सकती हैं ? क्योंकि मुझे तैरना नहीं आता."
मेंढकी ने देखा तो एक बिच्छु उसकी तरफ आ रहा था. अब उसने  बिच्छुओं के बारे में जो भी शुना था, वो तो डर गई, और डरते सहमते ही उसने बिच्छु से कहा, "अगर मैं तुम्हारी सहायता करूँ तो क्या तुम वचन देते हो कि तुम मुझे डंख नहीं मारोगे? देखो, मैं अपने परिवार से मिलाने जा रही हूँ, मुझे उनकी बहुत याद आ रही है और उनको भी मेरी याद आ रही होगी."
बिच्छू ने उत्तर दिया, "हे दया की मूर्ती, आप की चिंता मैं समझ रहा हूँ. मैं भी मेरे घर जा रहा हूँ, मेरे परिवार से मिलने. अगर मैंने आप को डंख मार दिया तो हम दोनों ही डूब जायेंगे, तो यह कौन चाहेगा? और पता नहीं आप ने हमारे बारे में क्या सुना है, लेकिन मैं तो केवल आत्मरक्षा में डंख मारता हूँ - जैसे अगर कोई सियार मुझे खाने आ रहा हो. आप मुझपर कृपा करें, मैं आप का आभारी रहूंगा."
मेंढकी ने उसके शब्दों  पर गौर किया - एक हत्यारे के शब्द तो नहीं लग रहे थे ! फिर उसने खुद की ही आशंकाओं को मनोमन उत्तर दिया - मैं तो इसका कोई नुक्सान नहीं कर रही हूँ, तो वो मुझे डंख क्यों मारेगा? अगर उसने डंख मार दिया तो हम दोनों डूब जायेंगे, और वो भी तो जीना चाहता ही होगा.  और अगर मैं उसकी सहायता करती हूँ तो वो मेरा मित्र बन जाएगा क्योंकि वो पहचान जाएगा कि मैं एक अच्छी मेंढकी हूँ. अब जब वो मेरा मित्र बनेगा तो पक्का है कि और बिच्छुओं से भी कहेगा कि कभी मुझे मिले तो मुझे डंख न मारे क्योंकि मैं उसकी मित्र हूँ. फिर वे मेरे परिवार और हमारे मित्रों को भी कभी डंख नहीं मारेंगे. और हमें भी उनको नदी नाले पार करने में सहायता करने में प्रसन्नता ही होगी. और यह भी हो सकता है कि सभी बिच्छु सभी मेंढकों के रक्षण कर्ता भी बन जाए ?
अपने ही इस कल्पनाविलास से मेंढकी इतनी उत्तेजित हो गयी थी कि उसने इसके विरोधी कारण सोचे भी नहीं. उसे सोचना भी नहीं था क्योंकि उसके कल्पना का भविष्य तो बहुत ही सुनहरा था, और इसमें खतरा तो महज एक बुरी कल्पनासे कुछ भी अधिक नहीं था. सहकर के नए युग की शुरुआत से उत्तेजित मेंढकी ने झुककर बिच्छु को ने पीठपर बिठाया और पानी में उतर गयी. पात्र के मध्यतक आई थी तो अचानक उसे एक चुभन महसूस हुई और तीव्र वेदना से वो काँपने लगी.
"उई ! क्या था यह ?" उसने चिल्लाकर पूछा.
"मैंने तुम्हें डंख मारा." बिच्छू ने ठंडक से जवाब दिया.
बिच्छु के जहर का परिणाम होने लगा था, मेढकी के लिए तेरा पाना मुश्किल हुए जा रहा था. उसने अपने विश्वबंधुत्व के विचारों के बारे में सोचा और रोकर चीखी - "पर तुमने ऐसा क्यों किया ? अब तो हम दोनों डूब जायेंगे. हम दोनों गहरे दोस्त हो सकते थे! जो भी हो, तुम कोशिश करो कि तैर कर पार हो जाओ, मैं तो मर रही हूँ."
लेकिन देर हो चुकी थी, और बिच्छुओं को तैरना नहीं आता. डूबते डूबते मेंढकी को बिच्छु का उत्तर सुनाई दिया - मैं तुम्हारे जैसा नहीं हूँ, हमें न दोस्ती करने की जरुरत है और न मौत से डर. हम झूठ बोलते हैं, डंख मारते हैं. यही हमारा स्वभाव है, क्या तुम्हें इतना भी पता नहीं था ?"
दोनों डूब गए. मरते मरते मेंढकी ने बिच्छू  के प्रश्न पर गौर किया और खुदको ही दोष दिया -"शायद मैंने कुछ कहा या किया आ जिससे गुस्सा हो कर उनने मुझे डंख मारा होगा !"
मेंढकी यह सोच न पायी कि बिछुओं की सोच उससे अलग हो सकती है.
THE END!

अनुवादित.
श्री आनंदराज्याध्यक्ष की फेसबुक वॉल से साभार

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