शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

कर्नल पुरोहित मामले की अनकही कहानी

#कर्नल_पुरोहित_मामले_की_अनकही_कहानी
2006 में #सेनाध्यक्ष थे जनरल #जे_जे_सिंह #जिन्होंने #वी_के_सिंह_के_साथ_विश्वासघात_किया_था...
2006 में रक्षा मन्त्रालय ने भविष्य में सेनाध्यक्ष बनने योग्य वरीय पदाधिकारियों की सूची बनायी तो उसमें वी के सिंह का नाम रक्षा मन्त्रालय को पसन्द नहीं आया क्योंकि वे रक्षा उपकरणों की खरीद में घोटाला करने वाली माफिया को नापसन्द थे...
तब वी के सिंह के पुराने गलत आवेदन पत्र को ढूँढकर उसी को मूल दस्तावेज मानने का निर्णय लिया गया ताकि वी के सिंह को एक वर्ष पहले ही रिटायर किया जा सके
इसके विरुद्ध वी के सिंह ने रक्षा मन्त्रालय में अर्जी दी और मौखिक तौर पर अदालत जाने की धमकी दी, रक्षा मन्त्रालय ने उनकी अर्जी को अनदेखा किया, किन्तु रक्षा मन्त्रालय को पता था कि वी के सिंह यदि अदालत चले गए तो मुकदमा जीत जायेंगे और रक्षा मन्त्रालय की किरकिरी हो जायेगी, तब एक षड्यन्त्र रचा गया, सेनाध्यक्ष ने वी के सिंह को मुख्यालय बुलाया और कहा कि रक्षा मंत्रालय में आपकी बात कोई नहीं सुनेगा, अतः वहां आप वैसा ही लिखकर दे दें ताकि मामला समाप्त हो जाय, उसके बाद मामला मेरे हाथों में चला आयेगा, उसके बाद आप जो चाहते हैं वैसा ही सही निर्णय मैं कर दूंगा...
वी के सिंह ने गलती यही की कि सेनाध्यक्ष पर भरोसा कर लिया और लिखकर दे सिया कि रक्षा मंत्रालय की बात से वे सहमत हैं (अर्थात गलत जन्मतिथि को ही सही मान ली) किन्तु बाद में सेनाध्यक्ष मुकर गए, बोले कि मैंने कोई आश्वासन नहीं दिया था, बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी वे के सिंह की याचिका यह कहकर ठुकरा दी कि आपने रक्षा मन्त्रालय के निर्णय को सही माने की बात लिखकर दे चुके थे, अतः अब उसे गलत कहने का आपको अधिकार नहीं है...
उनके बाद 1 अक्टूबर 2007 से 31 मार्च 2010 तक सेनाध्यक्ष थे जनरल दीपक कपूर इनके ही कार्यकाल में कर्नल पुरोहित को सेना मुख्यालय से जाँच हेतु ही कर्नल श्रीवास्तव बलपूर्वक उनको महाराष्ट्र ले गए (कर्नल श्रीवास्तव ने मूवमेंट आर्डर में स्वय गन्तव्य "सेना मुख्यालय" काटकर "मुम्बई" लिख दिया) और ATS के हवाले कर दिया, कर्नल श्रीवास्तव वरिष्ठ थे अतः कर्नल पुरोहित ने रास्ते में प्रतिवाद नहीं किया, किन्तु ATS की जाँच में कर्नल श्रीवास्तव पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अकारण भयंकर मारपीट और गालीगलौच आरम्भ कर दी जिसमें कुछ मिनट पश्चात ATS वालों ने भी हाथ बंटाया, कर्नल श्रीवास्तव का एक ही कथन था मालेगाँव विस्फोट कराने का जिम्मा कबूल कर लो वर्ना माँ-बहन और पत्नी को नंगा परेड करा दूंगा...
कर्नल पुरोहित ने इस अवैध हरकत की शिकायत सेना मुख्यालय से लेकर मंत्रालय तक की किन्तु कर्नल श्रीवास्तव पर कोई कार्यवाई आजतक नहीं हुई, कर्नल श्रीवास्तव सेना की मिलिट्री इंटेलिजेंस यूनिट के निदेशक थे, स्पष्ट है कि कर्नल श्रीवास्तव अपनी मनमर्जी से कार्य नहीं कर रहे थे, सेना मुख्यालय से मालेगाँव विस्फोट में संलिप्तता का आरोपपत्र लेकर कर्नल श्रीवास्तव आये थे, अतः सेना मुख्यालय का यह कथन सरासर असत्य है कि कर्नल पुरोहीय उनदिनों लापता थे, जबकि वे कर्नल श्रीवास्तव की गिरफ्त में थे जिनको सेना मुख्यालय ने भेजा था, अतः सेना मुख्यालय के उस उच्च अधिकारी की संलिप्तता है जिसने मालेगाँव विस्फोट में कर्नल पुरोहित के हाथ होने की जाँच का आदेशपत्र पत्र दिया और कर्नल श्रीवास्तव को अधिकृत किया...
यदि कर्नल पुरोहित लापता थे तो कर्नल श्रीवास्तव भी लापता होंगे क्योंकि दोनों एकसाथ थे, किन्तु सेना मुख्यालय कर्नल श्रीवास्तव को उनदिनों लापता नहीं मानती, इतना ही नहीं, बिना सेना मुख्यालय की अनुमति के महाराष्ट्र पुलिस की ATS को कोई अधिकार नहीं था कि वह कर्नल पुरोहित को गिरफ्तार करे, मध्यप्रदेश मे स्थित कर्नल पुरोहित को सीधे महाराष्ट्र ATS गिरफ्तार नहीं कर सकती थी, और थर्ड डिग्री अत्याचार करने में भी हिचकती,अतः सेना मुख्यालय ने एक वरिष्ठ अधिकारी को यह दायित्व सौंपा जो एक अनहोनी घटना है, यदि सेना मुख्यालय को अंदेशा था कि कर्नल पुरोहित ने कोई अवैध कार्य किया था तो उसकी जाँच के लिए सेना के पास अपनी जाँच मशीनरी और अपने कोर्ट मार्शल हैं, सेना कभी भी पुलिस को नहीं कहती कि कर्नल रैंक के अधिकारी की जाँच करे, सेना मुख्यालय ने अवश्य ही ऐसा आदेश दिया, किन्तु कर्नल पुरोहित को कोई सूचना नहीं दी गयी, सेना मुख्यालय में किस अधिकारी ने ऐसा किया यह आगे की घटना से स्वतः स्पष्ट हो जाएगा...
कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी के कुछ ही काल पश्चात सेना ने कर्नल पुरोहित के विरुद्ध उसी आरोप में कोर्ट ऑफ़ इन्क्वारी COI कराई जिसने कर्नल पुरोहित को दोषी ठहराते हुए उनको सेना से बर्खास्त करने और आवश्यक कार्यवाई करने का आदेश दिया, उस समय जनरल दीपक कपूर ही सेनाध्यक्ष थे...
इस COI ने सेना के Rule-180 का उल्लंघन करते हुए पक्षपातपूर्ण सुनवाई की थी, जिस कारण आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने इस COI को अवैध घोषित करते हुए 2011 ईसवी में पुनः नयी COI का आदेश दिया (http://post.jagran.com/reconvene-probe-against-purohit-aft-1299689515 , http://www.ndtv.com/india-news/lt-colonel-purohit-did-the-army-sell-short-an-effective-officer-490640) उस समय जनरल वी की सिंह सेनाध्यक्ष थे
मई 2012 में दूसरी COI विधिवत हुई जिसमें सभी पक्षों की वैध तरीके से सुनवाई हुई और निर्णय दिया गया कि कर्नल पुरोहित अपने कर्तव्य का पालन कर रहे थे और वरिष्ठ अधिकारियों को अपनी समस्त गतिविधियों की सूचना दे रहे थे, अतः निर्दोष हैं...
किन्तु उसी महीने 31 मई 2012 को जनरल वी के सिंह का कार्यकाल समाप्त हो गया, उसके बाद चार वर्षों तक COI की रिपोर्ट दबा दी गयी, अर्पणा पुरोहित को मांगने पर भी नहीं दी गयी, और अदालत में भी पेश नहीं की गयी जिस कारण कर्नल पुरोहित की जमानत NIA के आरोप के कारण न्यायालय ने ठुकराया था, जनरल वी के सिंह का रक्षा मन्त्रालय से मतभेद घटिया विदेशी ट्रक की खरीद के मामले पर हुआ जिसमें एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने जनरल वी के सिंह को 14 करोड़ रूपये घूस देने की पेशकश की, किन्तु शिकायत के बाद भी उस अधिकारी पर कोई कार्यवाई नहीं हुई और रक्षा मन्त्रालय ने जनरल वी के सिंह की सेवा एक वर्ष पहले ही समाप्त कर दी...
उनके बाद जनरल बिक्रम सिंह सेनाध्यक्ष बने जिन्होंने जनरल वी के सिंह के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसमे लेफ्टिनेंट जनरल दलबीर सिंह सुहाग की प्रोन्नति इस कारण रोक दी गयी थी चूँकि उन्होंने जोरहट डकैती काण्ड में अपनी चहेती एक महिला कप्तान को बचाने के लिए नियमों को ताक पर रख दिया था (उस घटना पर मैं बहुत पहले ही विस्तार से लिख चुका हूँ) फलस्वरूप प्रोन्नति हो गयी और जनरल दलबीर सिंह सुहाग 1 अगस्त 2014 से 31 दिसम्बर 2016 तक सेनाध्यक्ष रहे, ब्रिटिश राज के काल से आधुनिक काल तक वे पहले गोरखा अफसर थे जो इस पद तक पँहुचे, उनके बाद भी गोरखा राइफल्स के अधिकारी ही सेनाध्यक्ष बने जो भी भी हैं, मई 2014 में सरकार बदल गयी, किन्तु COI रिपोर्ट को दबाये रखने का केन्द्र सरकार और सेना का निर्णय ज्यों-का-त्यों रहा, सेना ने COI कराई थी तो उसका कार्यान्वयन हो इसे सुनिश्चित कराना सेना का ही दायित्व था, किन्तु सेना मुख्यालय ने वेतन देने के सिवा कुछ नहीं किया, कर्नल पुरोहित के पक्ष में केवल COI ही एकमात्र सबूत था जिसे सेना और सरकार ने दबाकर रखा
तब अर्पणा पुरोहित को अदालती आदेश लाना पडा जिसके बाद मनोहर पर्रीकर को आदेश देना पड़ा कि COI के वे हिस्से अर्पणा पुरोहित को दिए जाएँ जिनमे 76 सैन्य अधिकारियों की गवाही हुई थी, उन सबने कर्नल पुरोहित के निर्दोष होने की बात स्वीकारी थी मई 2012 में ही
किन्तु NIA हाल तक अपने पुराने रुख पर ही अड़ी हुई थी, हाल के सर्वोच्च न्यायालय में जमानत के मामले में भी NIA जमानत का विरोध करेगी यह समाचार जी-न्यूज़ जैसे राष्ट्रवादी चैनल में भी आया था, किन्तु COI की रिपोर्ट का जो हिस्सा अर्पणा पुरोहित को दिया गया था उसे अर्पणा पुरोहित ने एक नारीवादी संस्था "मानुषी" को दिया http://www.manushi.in/articles.php?articleId=1803#.WZ0VqSgjG00 और scribd पर अपलोड भी कर दिया, किन्तु (सेना मुख्यालय के प्रतिवाद करने पर) scribd से हटाया -- अब वहां COI का केवल Deletion Notice ही मिलेगा |
किन्तु रक्षा मन्त्रालय घबड़ा गयी -- अर्पणा पुरोहित जब COI की रिपोर्ट को सर्वोच्च न्यायालय में पेश करेंगी तो NIA किस आधार पर सेना के रिपोर्ट को गलत ठहरा सकेगी ?
तब निर्णय लिया गया कि NIA अपनी रिपोर्ट बदले और COI का अनुसरण करे, फलस्वरूप कर्नल पुरोहित को जमानत मिल सकी...
बहुत से राष्ट्रवादियों को समझ में नहीं आयेगा कि भाजपा सरकार ने अर्पणा पुरोहित को COI सौंपने से इनकार क्यों किया, जिस कारण अर्पणा पुरोहित को अदालत द्वारा आदेश कराना पडा... अर्पणा पुरोहित को COI नहीं दी जाती तो कर्नल पुरोहित आजीवन जेल में ही रहते, भाजपा सरकार ने उसी मालेगाँव काण्ड के अभियुक्त साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को छुड्वाया, किन्तु कर्नल पुरोहित पर सरकार खिसियाई हुई थी, क्योंकि COI की रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख है कि कर्नल पुरोहित ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इस बात की सूचना बहुत पहले ही दी थी कि राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के नेता इन्द्रेश कुमार का हाथ कई विस्फोटों में था, कांग्रेस ने झूठा प्रचार कराया था कि इन्द्रेश कुमार और मोहन भगवत को पाकिस्तान की ISI से पैसा मिलता था, ऐसा होता तो कांग्रेस सरकार उन दोनों को जेल भेज चुकी होती, किन्तु इन्द्रेश कुमार की विस्फोटों में संलिप्तता का बयान कर्नल पुरोहित ने COI में पूछताछ के दौरान दिया था जिस कारण संघ बिगड़ गया था, NDTV राष्ट्रवादी नहीं है, संघ विरोधी भी है, किन्तु उसका यह समाचार बिलकुल सही है क्योंकि इस मामले में सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से मेरी सीधी बातचीत हुई है जिनका नाम नहीं बताऊंगा -- http://www.ndtv.com/india-news/lt-colonel-purohit-did-the-army-sell-short-an-effective-officer-490640
भगवा आतंकवाद का झूठा हौवा खड़ा करने में कांग्रेस का कितना बड़ा हाथ था यह स्पष्ट हो चुका है, किन्तु सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी कर्नल पुरोहित के विरुद्ध षड्यन्त्र में हाथ बंटाया था जिसका कारण था विदेशों से हथियारों के आयात में कमीशनखोरों की आपसी मैत्री, भाजपा सरकार में भी नौकरशाही पहले जैसी ही है...
सिस्टम में कोई बदलाव नहीं आया, राफेल युद्धक विमान मोदी जी ने जितने में खरीदने का बयान आरम्भ में दिया था, उससे बहुत अधिक मूल्य देकर बाद में खरीद की गयी और फ्रांस की रजामन्दी के बावजूद राफेल बनाने का कारखाना बैंगलोर में लगाने का प्रस्ताव भाजपा सरकार ने ठुकरा दिया मनोहर पर्रीकर के काल में, सरकार के मन्त्री एक पैसा घूस न भी खाएं तो भी घूस खाने वालों की कमी नहीं है
भारत संसार में हथियारों का सबसे बड़ा आयातक है, भयंकर घूसखोरी है, यही कारण है जनरल वी के सिंह को रक्षा मन्त्रालय से दूर रखने का...
भगवा आतंकवाद का हौवा खड़ा करने से पाकिस्तान को यह कहने का बहाना मिला कि आतंकवादी हिन्दू होते हैं, समझौता एक्सप्रेस काण्ड में भी ATS ने कर्नल पुरोहित का नाम डाल दिया था और उनको पाकिस्तान को सौंपने की बात चल रही थी, वह तो अमरीका में ही उस काण्ड का भण्डाफोड़ हो गया और महाराष्ट्र ATS ने कर्नल पुरोहित को फँसाने के लिए माफी मांग ली...
क्या माफी मांगने पर ऐसे लोगों को माफ़ कर देना चाहिए ? मेरी मांग यह है कि सेना और ATS के उन सभी अधिकारियों पर आपलोग मिलकर कोई PIL दायर कराएं जिनलोगों ने एक देशभक्त और निर्दोष व्यक्ति के साथ ऐसा अमानवीय और देशद्रोह वाला षड्यन्त्र रचा, तब इस काण्ड में संलिप्तता के कारण कांग्रेस के नेतागण स्वतः फँसने लगेंगे...
ऐसा PIL दायर हो इसके लिए पहले आवश्यक है कि उपरोक्त बातों का जमकर प्रचार हो, मीडिया तो अब यह बताती भी नहीं कि COI की पहली रिपोर्ट अवैध घोषित हो गयी थी जिस कारण पुनः COI कराई गयी जिसकी अनुशंसा के कारण कर्नल पुरोहित का वेतन बन्द नहीं हुआ,
अन्धभक्तों को अपनी मानसिकता पर पुनर्विचार करना चाहिए (हालाँकि यह सम्भव नहीं है) कर्नल पुरोहित ने COI में इन्द्रेश कुमार का नाम क्यों लिया, क्या इस कारण एक निर्दोष और देशभक्त अधिकारी को आजीवन बिना सुनवाई के जेल में रखना चाहिए ?
अर्पण पुरोहित को COI के केवल वे तीन अंश दिए गए (परिशिष्ट 2, 3, 4) जिनमें 76 सैन्य अधिकारियों की गवाही थी, COI का मुख्य रिपोर्ट (परिशिष्ट सहित साढ़े आठ सौ पेज) उनको नहीं दिया गया, जिनकी अनेक मुख्य बातों का खुलासा मैंने प्रस्तुत लेख में किया है...
सरकार का कहना सही है कि पूरी रिपोर्ट अदालत को सौंपने या सार्वजनिक करने से देश की सुरक्षा को ख़तरा हो जाएगा, क्योंकि देश का अर्थ है मन्त्रालय के नेता और नौकरशाह एवं सेना के मुट्ठीभर भ्रष्ट अधिकारी, हमलोग "देश" नहीं हैं, कीड़े-मकोड़े हैं...
मेरी ही तरह दूसरे समस्त कीड़ों-मकोडो से अपील है कि मगरमच्छों को बेनकाब करने की मुहीम छेड़ दें...
कर्नल पुरोहित सेना में कार्यरत हैं, अपने ही अधिकारियों के विरुद्ध नहीं बोलेंगे, यह सैन्य अनुशासन के विरुद्ध है, तो फिर कौन बोलेगा ? यह भारत है या पाकिस्तान ?
आतंकवाद के "दरभंगा मोड्यूल" की चर्चा आप लोगों ने सुनी होगी, इसके संस्थापक का नाम कोई नहीं लेता, मोहम्मद अली अशरफ फातमी जो लालू यादव की पार्टी से सांसद और केन्द्र में राज्यमन्त्री रह चुके हैं, जब उनको कोई नहीं जानता था और वे सऊदी अरब में रहते थे तब दावूद इब्राहिम ने उनको 50 लाख रूपये का चेक देकर दरभंगा से 1991 में लोक सभा का चुनाव लड़ने भेजा था जिसमें वे जीते भी थे, उसी समय सरकारी टीवी दूरदर्शन ने खबर चलाई थी लेकिन सबूत CBI 26 वर्षों से दबाकर बैठी हुई है, दरभंगा संसदीय क्षेत्र को भाजपा ने भागलपुरी कीर्ति झा आज़ाद को सौंप दिया जिसे क्रिकेट के अलावा कुछ सूझता ही नहीं है...
सही जाँच हुई तो वे सभी हिन्दू-विरोधी नेता जेल चले जायेंगे जो आज कर्नल पुरोहित के छूटने से परेशान हैं...
लेकिन इसके लिए जन-जागरण और जन-अभियान आवश्यक है, वरना कोई भी सरकार कुछ नहीं करेगी...
लोकतन्त्र में लोक जैसा होता है उसे वैसा ही तन्त्र मिलता है
लोक सुधरेंगे, तन्त्र सुधरेगा
मोदी सरकार ही कुछ सुधार करने में सक्षम है

साभार
श्री रुद्र अनीश

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें