शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

क्या भगत सिंह वामपंथी थे?

भगत सिंह वामपंथी थे ??
वाक़ई ???
मैं नास्तिक क्यूँ हूँ ??
भगत सिंह को वामपंथी तब बनाया गया जब माओ छाओ लेनिन मरकस सब अपने काले कारनामों की वजह से फ़ेल हो चुके थे यूथ आइकॉन चे गुवेरा को बनाने की भरपूर कोशिश हुई लेकिन उसकी ऐसी भद्द पिटी थी की युवा वामपंथ की तरह आकर्षित होना तो दूर थूकते तक न थे
बूढ़ा निर्जीव निराधार वामपंथ उस समय चालाकी से एक महान क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त भगत सिंह को युवा आइकॉन बना कर खड़ा करता है
और उसका आधार बनाया जाता है भगत सिंह का वो काल्पनिक पत्र जिसका शीर्षक है “मैं नास्तिक क्यूँ हूँ “ काल्पनिक इसलिए कि उस पत्र को जिसने पहली बार छापा उसने भी यह ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया की पत्र की मूल प्रति कभी उसने देखी भी है
और धीरे धीरे उस पत्र ने एक पूरी पुस्तक का रूप ले लिया जिसके बारे में वामपंथी ही नहीं वरन अमूमन सभी यही सोचते हैं कि यह भगत सिंह ने लिखी है
यह सिर्फ़ एक पत्र तक सीमित नहीं है वामपंथी पत्रकार और लेखकों ने कुन्तल भर स्याही ख़ाली इसी को साबित करने ओर ख़र्च दी है तमाम पत्रिकाओं और अखबारो में लिखकर आज भी हर साल २३ मार्च को यह लेख ज़रूर छपता है सोचिए क्यूँ ??
जबकि कॉम्युनिस्टों से यदि यह पूछा जाए कि कि भैया वामपंथ के नए पुरोधा युवा आइकॉन का वह पत्र कहाँ है तो कोई जवाब नहीं मिलता क्या युवा आइकॉन इतना भी महत्व नहीं रखते थे की उनका पत्र सुरक्षित रखा जाए कम से कम कॉम्युनिस्ट लाइब्रेरी में ही सही ??
और इसी काल्पनिक पत्र को आधार बनाकर वमाओंथियों ने भगत सिंह को मरकस बाबा के उस वाक्य के अनुसार वामपंथी घोषित कर दिया जिसमें उन्होंने कहा था की वामपंथ के लिए नास्तिक या अनिश्वरवादी (athiest) होना आवश्यक शर्त है लेकिन क्या उन्होंने यह कहा था की अनिश्वरवादी वामपंथी ही होगा ??
ख़ैर आगे बढ़िए और उस समय के वामपंथी नेता या आइकॉन लोगों के विचारों पर ग़ौर कीजिए कि भगत सिंह के बारे में उनकी राय क्या थी इसके लिए सत्येन्द्र नारायण मजूमदार की 1979 में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस द्वारा प्रकाशित पुस्तक "इन सर्च आफ ए रिवोल्यूशनरी आइडियोलाजी" को पढ़ना पर्याप्त है. इस किताब में उन्होंने भगत सिंह की निंदा करते हुए उन्हें एक मूर्ख, अति उत्साही, भावुक और रोमांटिक क्रांतिकारी बताते हुये उनके बारे में कहा है कि उस मूर्ख को सामूहिकता के साथ काम करना नहीं आता था.
साथ ही एक और क्रांतिकारी वामपंथी अजय घोष के अनुसार भगत का असेम्ब्ली में बम फेंकना और फाँसी पर लटकाना एक मूर्खता भरा व्यक्तिगत निर्णय था जिसकी कॉम्युनिस्ट पार्टी भर्त्सना करती है तो यह तो थे समकालीन वामपंथियों की सोच के नमूने जो वह भगत सिंह के बारे में सोचते थे
अब एकदम से ऐसा क्या हो गया की भगत सिंह ही चाहिए वामपंथी जानते हैं की युवा मस्तिष्क को मरोड़ना आसान टार्गट है इसलिए उन्हें एक युवा की तलाश थी चुकी चेगुवेरा फ़ेल हो चुके थे इसलिए भगत सिंह चाहिए
एक और वृतांत है की भगत सिंह फाँसी से पहले मरकस बाबा और लेनिन को पढ़ रहे थे क्या पढ़ रहे थे उनकी जीवनी ,कब पब्लिश हुई ?? फाँसी के पहले या बाद में ?? और अगर पढ़ भी रहे थे तो हमने भी वामपंथ पर तमाम पुस्तक पढ़ी हैं - तो क्या हम वामपंथी हुए  ??
क्या इसी आधार पर हम भगत सिंह को संघी न क़रार कर दें अख़िर उन्होंने वीर सावरकर के विचार अपने ख़र्चे से छपवाकर लोगों में बाँटे थे (इसके प्रमाण उपलब्ध हैं ) तो उनको हिंदुवादी संघी क्यूँ न माना जाए ??
किसी की मृत्यु के उपरांत उसकी विचारधारा की हत्या करना वामपंथियों से अच्छा कोई नहीं जानता गांधी की विचारधारा की हत्या भी इन्होंने ही की सुभाष बाबू को तोजो का कुत्ता इन्होंने ही कहा अगर कुछ रह गया हो जो वामपंथी भाई लोग और तर्क रखते हो तो कमेंट में कहिए उसका भी जवाब दिया जाएगा इनके छल से वाक़िफ़ होईए और जब भी यह कहें यो इनसे यह सवाल पूछते रहिए जो इस लेख के माध्यम से उठाए हैं
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आभार
श्री शैलेंद्र सिंह

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