सोमवार, 1 अप्रैल 2019

चीन से क्या सीखना है

चाइना से क्या सीखना है......
#TheCivilisationalChallenge (4) -  डॉ राजीव मिश्रा
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आज भारत में चीन को बुरा भला कहने का मौसम है. पर सच्चाई यह है कि एक सभ्यता के रूप में चीन की आँखें तेज हैं और कान खराब हैं. चीन को सुनाई नहीं देता कि उसे कौन क्या कहता है. पर उसे अपने हित हमेशा साफ दिखाई देते हैं.
चीन ने कभी दुनिया की परवाह नहीं की. बल्कि चीन के लिए बाकी दुनिया एक साइड शो ही रही है. चीनी सभ्यता हमेशा अपने आपको दुनिया का केंद्र मानती आई है. बल्कि अपने देश के लिए प्रयोग होने वाले चीनी कैरेक्टर्स का चीनी भाषा में अर्थ होता है मध्य-भूमि या मिडिल किंग्डम.
चीनी सभ्यता इतिहास की एक विराट सभ्यता रही है. चीन हमेशा से विज्ञान, कला, वाणिज्य और सैन्य शक्ति के अर्थ में एक सुपर पॉवर रहा है. हम आज चाहे चीन के लोगों की कद काठी, आँख और नाक का और सस्ते चीनी माल की गुणवत्ता पर कितने भी लतीफे बनाते हों, चीन अपने बारे में बिल्कुल निर्द्वंद और निश्चिंत रहा है. वैश्विक पटल पर चीन की सेल्फ इमेज निर्विवाद श्रेष्ठता के अलावा और कुछ कभी रही ही नहीं.
दुनिया के हर देश की तरह चीन भी अपने बुरे काल से गुजरा जब देश की स्वायत्तता और स्वतंत्रता बंधक पड़ी थी. पर भारत के विपरीत चीन अपने इतिहास को अपनी गुलामी के कॉन्टेक्स्ट में नहीं देखता. एक औसत चीनी अपने इतिहास को सदैव विशिष्ट और श्रेष्ठ ही मानता है, और बीच के 150 वर्षों के कालखंड को एक फिसलन या चूक से ज्यादा कुछ नहीं समझता. इसके मुकाबले भारत का इतिहास कुछ इस तरह से लिखा गया है कि हमारी पूरी पहचान ही गुलामी और हार के संदर्भ में की गई है.
पर गुलामी के वे डेढ़ दो सौ साल चीन के लिए बड़े ही अपमान के साल थे. इंग्लैंड ने जबरदस्ती चीन को अफीम का बाजार बना दिया था. जापान ने 1895 में चीन को बुरी तरह हराया और मंचूरिया पर कब्जा कर लिया. चीन को भी जैसे अपमान सहने की आदत हो गई थी.
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वर्साई की संधि में जब जापान ने सरेंडर किया तो संधि की शर्तों के मुताबिक शानदोंग प्रान्त जर्मनी के कब्जे से निकल कर जापान के नियंत्रण में आ गया. इसके विरुद्ध चीन में एक स्वतःस्फूर्त विद्रोह की चिंगारी भड़क उठी जिसे 4 मई आंदोलन (1919) के नाम से जाना गया.
4 मई के इस आंदोलन को आधुनिक चीन की संक्रमण तिथि भी समझा जा सकता है. आधुनिक चीन के जितने भी राष्ट्रीय नेता हुए, सभी इस 4 मई आंदोलन की उपज थे. इस दौर में चीन को लू शुन जैसे आग उगलते लेखक और विचारक मिले, और एक पूरी पीढ़ी रूसी कम्युनिस्ट आंदोलन की आँच को महसूस करते हुए बड़ी हुई.
अपनी डेढ़ सौ सालों के पराभव से भटक कर चीन कम्युनिस्ट आंदोलन की खाई में जा गिरा. पर चीन का कम्युनिस्ट आंदोलन भी मूलतः एक वामपंथी आंदोलन नहीं था. यह चीनी राष्ट्रवाद की ही अभिव्यक्ति थी, पर जिसने उन्हें एक नया आर्थिक, सामाजिक प्रयोग दुहराने को प्रेरित किया.
पर यह प्रयोग चीन को बहुत ही महँगा पड़ा. चीन माओ जैसे दंभी, आत्मकेंद्रित और आत्ममुग्ध नेता के हाथ में चला गया जिसने चीन की आजादी के बाद एक चौथाई सदी तक देश के साथ साम्यवाद के मनमाने प्रयोग किये. इस काल में चीन ने अपनी परंपरागत सभ्यता को ना सिर्फ नकार दिया, बल्कि उसे नष्ट करने के प्रयासों में कोई कसर नहीं छोड़ी.
पर माओ के जाते ही चीन ने इस भटकन से निकलने में जरा भी समय बर्बाद नहीं किया. चीन ने देंग के कुशल नेतृत्व में वापस प्रगति की राह पकड़ी. अब भी यह पुराना, परंपरागत चीन नहीं था, पर यह एक टिपिकल कम्युनिस्ट राज्य भी नहीं रह गया. शासन वहाँ किसी ना किसी का तो होना था, तो कम्युनिस्ट पार्टी आज भी सत्ता में है. उन्होंने कोई डेमोक्रेसी का तमाशा नहीं उठाया. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बखेड़ा भी नहीं है. पर देश में मुक्त व्यापार और पूंजीवाद जैसे विचार वर्जित नहीं हैं. बल्कि दुनिया के सारे देशों में चीन ही है जहाँ कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार तो है पर वामपंथी वैचारिक गंदगी नहीं है. चीन की कहानी सुबह के भूले की शाम को घर लौट कर आने की कहानी है.
चीन के लिए शाम तक घर लौटना क्यों संभव हुआ? क्यों चीन की वह दुर्गति नहीं हुई जो दूसरे कम्युनिस्ट देशों की हुई?
क्योंकि चीन भटका तो था, पर उसका सांस्कृतिक कॉम्पास नहीं खोया था. उन्होंने थोड़े समय के लिए उस कॉम्पास का प्रयोग करना, उसपर भरोसा करना बन्द कर दिया था, और टटोल कर रास्ता ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे थे, पर अपनी सांस्कृतिक विरासत की स्मृति ने उन्हें वापसी की राह दिखाई.
चीन ने पिछली सदी में सबसे ज्यादा बदलाव देखे. पर इस सारे बदलाव के बीच, कुछ ऐसा हुआ कि चीन ने अपनी धुरी नहीं खोई. उनके हितों का बोध पूरी तरह से दृष्टि से ओझल नहीं हुआ. कम्युनिज्म उनके लिए एक सिद्धांत नहीं, एक प्रयोग मात्र था. सफल नहीं हुआ तो उन्होंने इसका ढाँचा वही रहने दिया, पर इसका इंजन बदल दिया.
यही चीन के सर्वाइवल का मंत्र रहा- सिद्धांत की अपने आप में कोई सत्ता नहीं है. उनकी उपयोगिता तभी तक है जब तक वे एक सक्षम तंत्र देते हैं. अगर तंत्र का कोई पुर्जा काम नहीं करता तो वे उसे बदलने से परहेज नहीं करते.
चीन की इस आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रिकवरी के पीछे उनके नेता देंग सियाओ पिंग का एक सूक्त वाक्य महत्वपूर्ण है. देंग ने एक पुरानी चीनी कहावत को उद्धृत करते हुए कहा था - "क्या फर्क पड़ता है कि बिल्ली सफेद है या काली, अगर वह चूहे पकड़ती है."
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