सोमवार, 1 अप्रैल 2019

इतिहास से हिन्दू कब सबक लेगा

“बेवकूफ और चूतिये में धागे भर का फर्क होता है, और जो धागा हैन्चो तो कौन है बेवक़ूफ़ और कौन चूतिया, करोड़ रुपये का प्रश्न है भैया !” ये ओंकारा फिल्म में लंगड़ा त्यागी नाम के किरदार पर फिल्माया गया प्रसिद्ध डायलॉग सबने सुना ही होगा | अब भारत का जरा भारत का नक्शा देखिये | अभी वाला बाद में पुराना अशोक के ज़माने वाला नक्शा पहले देखिये |
कहाँ तक था बॉर्डर वो तो दिख ही रहा होगा ? हमले कब से शुरू हुए भारत पर ? 1000 साल से थोड़ा ज्यादा ही हो गया है | इतने साल में कितनी जमीन खो दी है वो नक़्शे से अंदाजा हो ही रहा होगा | अब सोचिये कि इतने साल से हारते क्यों रहे ?
ध्यान ना गया हो तो “अहंकार भगवान् का भोजन है” वाली लोकोक्ति याद कर लीजिये | कई साल पहले का जो रामायण वाला किस्सा आप पढ़ते हैं, उसमें लंकापति भी ऐसे ही घमंड में थे | सोचते थे भाई राम सेना लेकर आ भी गया तो क्या ? समंदर पार कर के लंका तक सेना लाएगा कैसे | राम जी ने येन केन प्रकारेण समुद्र पार करने का इंतजाम कर डाला, आगे क्या हुआ आप जानते हैं | महाभारत भी याद होगा, उसमें दुर्योधन भी ऐसा ही सोचता हुआ पाया जाता है | उसका ख़याल था कि मेरी साइड तो ना हारने वाले योद्धा हैं ! भीष्म हारेंगे नहीं, वो हार गए तो द्रोण नहीं हारेंगे, वो भी हारे तो मेरे पास कर्ण तो है ही ! तीनो के हथियार किसी न किसी तरीके से रखवा लिए गए, दुर्योधन को खदेड़ कर मारा गया |
इन ग्रंथों का भारतीय क्या करते हैं ? लाल कपड़े में लपेट कर अगरबत्ती दिखाते हैं बस | कभी पढ़ के देखा होता तो हार के कारण भी दिखते उन्हें | लेकिन चूँकि नहीं देखा कभी हार के कारणों को इसलिए कहते हैं कि “बेवक़ूफ़ और चूतिये में धागे भर का फर्क होता है” | इसको आगे ले आ कर देखिये | “दरवाजे पर हाथी बंधा होता है”, किसी के बारे में ये कब कहा जाता है ? जब उसे बड़ा अमीर, बड़ा शक्तिशाली घोषित करना हो तभी ना ? घमंड, गर्व, अहंकार का विषय होता है हाथी | ये युद्ध में किस काम का होता है, वो देखेंगे तो पता चलेगा कि हाथियों से कभी कोई युद्ध नहीं जीता गया | ना ना साहेब नाक मत सिकोड़ना शुरू कीजिये, आपके सौ तर्कों के जवाब में हम बड़ी आसानी से बता सकते हैं कि महाभारत की लड़ाई में भगदत्त और उसके हाथियों की सेना कौरवों की तरफ से थी | घोड़ो वाले रथ पर सवार अर्जुन ने उसे मार गिराया था और हाथियों की फौज ने फिर कौरवों का ही नुकसान किया था |
बाद में लोग सुधर गए ? नहीं बिलकुल नहीं सुधरे | 326 BC में एलेग्जेंडर घोड़े पर और उसके खिलाफ़ पोरस हाथी पर था | 710 AD में मुहम्मद बिन कासिम घोड़े पर और उसके खिलाफ़ राजा दाहिर हाथी पर था | 1009 AD में महमूद गजनी घोड़े पर और उसके खिलाफ़ आनंदपाल हाथी पर था | 1192 AD में मुहम्मद गौरी घोड़े पर और उसके खिलाफ़ पृथ्वीराज चौहान हाथी पर था | किस लड़ाई में कौन हारा था ये बताने की कोई जरुरत नहीं है | आप हरेक लड़ाई का नतीजा जानते हैं | अब सोचिये कि क्या हो रहा था इन युद्धों के समय में ? क्या था जो नहीं बदला था ?
घमंड नहीं बदला था | अपने आप को ये बड़े धर्मपरायण समझने वाले लोग थे जो मारे गए और उनकी बहनों, बेटियों, बहुओं को हमलावर ले गए | इनकी समझ में ये नहीं आया था कि हमले का तरीका बदलने पर लड़ाई के तरीके भी बदले जाते हैं | तैयारी उसी हिसाब से करनी होगी | आपका हाथी पालने का घमंड आपको युद्ध में जिन्दा नहीं रखता | हाथी बहु-बेटियों की सुरक्षा की गारंटी भी नहीं है | अगर राजा युद्ध में हार जाए और दुश्मन की फौज राज्य की तरफ बढ़ेगी तो हाथी पर बैठकर तो भाग भी नहीं सकते न ? घोड़े पर तो भागने की कोई सोचेगा भी !
ये कहाँ बदला हुआ दिखता है ? कोशिश कीजिये याद करने की | महाराणा प्रताप के साथ क्या याद आता है ? उनकी 25-50 हज़ार की फौज़ से लड़ने के लिए कितने लाख सिपाहियों की जरुरत पड़ती थी मुगलों को ? वो जब चेतक जैसे घोड़े पर होते थे तो उनका विपक्षी हाथी पर था क्या ? शिवाजी को याद कर लीजिये, वीर कुंवर सिंह याद कीजिये, झाँसी की रानी याद कीजिये, तांत्या टोपे याद कीजिये, लगातार कई कई लड़ाइयाँ जीतने वाले ये लोग कैसे याद आते हैं ? अपने हाथी के घमंड पर सवार कौन याद आता है, अपने घोड़े पर चपल-चुस्त सा कौन है ?
अभी के लड़ाई के तरीके भी तो फिर से बदल चुके हैं ना ? पता तो होगा ही, खैर, तो आपके लड़ने के तरीके बदले हैं क्या ? ओह प्रोपोगैंडा, प्रचार तंत्र के हमलों से निपटने के लिए आपने कोई तैयारी नहीं की क्या ? मतलब हाल में ही उस दीपक शर्मा को अपने इंडिया संवाद नाम के वेबसाइट से, अमिताभ के चार करोड़ लेने का झूठ फैलाते तो देखा ही होगा | तो इन्टरनेट, सोशल मीडिया मैनेजमेंट के तरीके सीखे क्या आपने ? मीडिया के हमले की तयारी नहीं की, अच्छा अच्छा आपको अंग्रेजी नहीं आती ना ! भला जब किताबें आपको हिंदी में मिली ही नहीं तो आप कैसे उन्हें पढ़कर तैयारी करते ?
एक नवाब साहब भी जब अंग्रेजों के हमले में गिरफ्तार हुए तो उनसे पुछा गया था कि आप भागे क्यों नहीं ? उन्होंने बताया था कि कोई पलंग के नीचे से जूते निकाल के देने वाला नौकर था ही नहीं ! सब भाग गए थे, जूते किसी ने दिए ही नहीं ! बिना जूते पहने नवाब साहब भागते कैसे ? पहले अंग्रेजी सीखनी होगी, फिर आप किताबें पढ़कर कुछ इतिहास जानेंगे, फिर संस्कृत को बचाए रखने के लिए उसे बच्चों को भी सिखाना है | कितनी मेहनत का काम है, पलंग के नीचे से कोई नौकर जूते निकाल देता तो अच्छा होता | कोई अनुवाद ही नहीं करेगा, तो आप पढेंगे कैसे ? आप बिलकुल सही सोच रहे हैं, जूते पहनायेगा कोई तब तो भागिएगा |
बाकी हर बार बेवक़ूफ़ और चूतिये का फर्क करने के लिए धागा नहीं खींचना पड़ता, कभी कभी बेवक़ूफ़ ही चूतिया भी होता है ! समझ रहे हैं ना ?
- Anand Kumar

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